संवाद न्यूज एजेंसी
जगाधरी। चैत्र नवरात्र के छठे दिन श्रद्धालुओं ने घर पर ही रहकर मां के देवी कात्यायनी की उपासना की। वहीं सोमवार को चैत्र शुल्क की सप्तमी तिथि है। इस दिन मां के दुष्ट दलन और प्रलयकारी स्वरूप मां कालरात्रि की आराधना का विधान है।
पंडित महेश शांडिल्य के अनुसार मां का यह रौद्र रूप बेहद भयंकर माना जाता है। मां ने यह रूप दुष्टों का संहार करने के लिए धरा था। इनका वर्ण काला और लंबे बिखरे हुए केश हैं। मां तीन ब्रह्मांड की तरह तीन विशाल गोल नेत्र हैं। इसलिए इन्हें त्रिनेत्री भी कहा जाता है। गले में विघुत की अद्भुत माला है। चतुर्भुज मां के एक हाथ में खड्ग और कांटा है। तीसरे हाथ अभय मुद्रा में और चौथा वरमुद्रा में है। इनका वाहन गर्दभ अर्थात गधा है, जो भूमंडल में सबसे ज्यादा परिश्रमी और निर्भय प्राणी है। इसी वाहन पर वे ब्रह्मांड का निरीक्षण करती हैं।
पंडित शांडिल्य ने बताया कि मां कालरात्रि हमेशा अपने भक्तों पर कृपा बरसाती है और शुभ फल प्रदान करती है। इसलिए मां को शुभंकरी भी कहा जाता है। देवी भागवत पुराण के अनुसार, मां कालरात्रि अभय वरदान के साथ ग्रह बाधाओं को दूर करती हैं। वहीं आकस्मिक संकट, दुर्घटना इत्यादि से भी मुक्ति मिलती है। मां के रौद्र रूप के कारण इन्हें कई प्रचंड नामों से जाना जाता है। इन्हें काली, महाकाली, भद्रकाली, भैरवी, मिृत्यू, रुद्रानी, चामुंडा, चंडी, रौद्री, कपालनी, त्रिनेत्री और धुमोरना देवी के नाम से जाना जाता है।
इस तरह करें पूजा
इनकी कृपा प्राप्त करने के लिए गंगाजल, गंध, पुष्प, अक्षत, पंचामृत और अक्षत से मां की पूजा की जाती है। इसके अलावा मां दुर्गा के इस रूप को गुड़ का भोग लगाया जाता है। देवी का यह स्वरूप तमाम ऋद्धि-सिद्धियों प्रदान करता है। मां अपने इस रूप में भक्तों को काल से बचाती हैं अर्थात जो भक्त मां के इस रूप की पूजा करता है, उसकी अकाल मृत्यु नहीं होती है। पंडित महेश शांडिल्य ने बताया कि नवरात्र के अन्य दिनों की तरह ही मां की पूजा की जाती है। परंतु मां कालरात्रि की पूजा में विशेष विधान है। पूजन के दौरान सिद्ध मंत्र ओउम् ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चै ऊं कालरात्रि दैव्ये नम: मंत्र का जाप करना चाहिए।
सभी सिद्धियों की देवी हैं मां कालरात्रि
पुराणों में मां कालरात्रि को सभी सिद्धियों की देवी कहा गया है और इनकी उत्पत्ति दैत्य चंड-मुंड के वध के लिए हुई थी। चंड मुंड नामक दो दैत्यों का संहार करने के कारण इनका नाम चामुंड पड़ा। मां की पूजा करने से क्रोध पर विजय प्राप्त होती है और मां भक्तों की हर मुराद को पूरा करती हैं। शत्रुओं को नियंत्रित और भयभीत रखने के लिए इनकी पूजा सर्वोच्च मानी जाती है। मान्यता है कि मां के इस रूप से काल भी भयभीत रहता है। नकारात्मक ऊर्जा का (तांत्रिक क्रिया) साधक पर कोई असर नहीं होता। दुष्टात्मा, प्रेत, यक्ष, गंधर्व का भय नहीं सताता। वहीं ज्योतिष में सबसे प्रबल ग्रह शनि को नियंत्रित करने के लिए मां कालरात्रि की पूजा फलकारी होती है।