जगाधरी। एक तरफ जहां स्कूलों में निजी प्रकाशकों की किताबों के नाम पर अभिभावकों की जेब पर आर्थिक बोझ बढ़ गया है। वहीं, दूसरी तरफ वर्दी के नाम पर अभिभावकों से अधिक राशि वसूली जा रही है। नए सत्र में अभिभावकों को नई किताबों के साथ नई वर्दी भी खरीदने के लिए बाध्य किया जा रहा है। जिससे उनकी मुश्किलें और बढ़ गई हैं। इसके लिए भी बाजारों में दुकानें पहले से ही निर्धारित हैं। यह पहली से आठवीं की किताबों में सबसे ज्यादा हो रहा है।
निजी विद्यालयों में नया सत्र आज से शुरू हो गया है। ऐसे में किताबों की दुकानों पर लोगों की भीड़ और बढ़ गई है। लोगों में किताबें खरीदने की होड़ दिखाई दे रही है। सुबह आठ बजे दुकानें खुलने से देर शाम तक लोगों की खूब भीड़ लगी है। इसका कारण स्कूलों द्वारा दुकान निर्धारित किए जाना है। चूंकि अभिभावक किसी अन्य दुकान से किताबें नहीं खरीद सकते हैं। सभी दुकानों पर निजी प्रकाशकों की किताबें मिल रही है। सबसे ज्यादा पहली से आठवीं कक्षा में निजी प्रकाशकों की किताबें लगाई जा रही हैं। चूंकि इसके बाद बोर्ड के नियम लागू हो जाते हैं। सातवीं व आठवीं में दो तरह की किताबें पढ़ाई जा रही हैं। हालांकि इन किताबों का मूल पढ़ाई से कोई लेना-देना नहीं है। खुलेआम चल रही किताबों के नाम पर हो रही इस मनमानी पर विभाग की ओर से कोई कार्रवाई नहीं की जा रही जबकि नियमानुसार स्कूल अभिभावकों को किसी विशेष दुकान से किताबें, वर्दियां व अन्य सामान खरीदने को मजबूर नहीं कर सकते हैं। यदि ऐसा किया जाता है तो कार्रवाई का प्रावधान है।
नई वर्दियां भी लेनी है जरूरी
प्रबंधकों का कहना है कि पिछले वर्ष ली वर्दियों में सालभर बाद रौनक नहीं रहती है। ऐसे तर्क देकर अभिभावकों को वर्दियां खरीदने के लिए भी विवश किया जा रहा है। यही नहीं वर्दियों के लिए भी स्कूलों की ओर से दुकानें पहले से ही निर्धारित की गई हैं। अभिभावकों को स्कूल की ओर से निर्धारित दुकान से ही वर्दी खरीदनी पड़ रही है। इन दुकानों पर किसी तरह की कोई छूट नहीं मिलती है। पेंट, शर्ट, जुराब, टाई, बेल्ट सहित अन्य सभी सामग्री के दाम पहले से ही तय हैं और इस पर कोई मोल भाव नहीं किया जाता है। यदि बाजार से तुलना करें तो यह वर्दियों पांच से छह गुना महंगी हैं। बाजार में 28 से 32 साइज की अच्छी गुणवत्ता वाली सफेद शर्ट की कीमत 200 से 250 रुपये है। परंतु निर्धारित दुकानों पर इनकी कीमत 600 रुपये से भी ज्यादा है। परंतु मजबूरी में अभिभावक यह खरीद रहे हैं।
वर्जन
किसी स्कूल में एनसीईआरटी और एससीईआरटी के अलावा निजी प्रकाशकों की किताबें नहीं लगवा सकते हैं। यदि ऐसा किया जा रहा है तो यह कार्रवाई के दायरे में आता है। विभाग के पास इससे संबंधी कोई शिकायत नहीं आई है। विभाग अपने स्तर पर जांच करेगा।
अशोक राणा, जिला मौलिक अधिकारी।