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कभी सिर्फ आंखें ही कर रहीं थी काम, अब खुद के साथ दूसरों को भी कर रहीं पैरों पर खड़ा

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कभी सिर्फ आंखें ही कर रहीं थी काम, अब दूसरों के लिए बनीं हौसले की मिसाल
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छह माह की उम्र में पोलियो ग्रस्त होने के बाद भी नहीं छूटी जिंदगी जीने की आस
50 वर्षोें की संघर्ष भरी जिंदगी में डॉ. ऋतु सोनी ने बना डाली अपनी अलग पहचान
अमर उजाला ब्यूरो
यमुनानगर। ऐसे लोगों की संख्या बहुुत कम है, जिन्होंने शारीरिक अक्षमता के बावजूद जिंदगी में दूसरों को प्रेरणा दी है। मेेहनत और लगन के साथ नित नए मुकाम हासिल किए हैं और हंसते हंसते कठिनाईयों को सहते हुए समाज में मिसाल कायम की है। हम बात कर रहे हैं प्रोफेसर कॉलोनी की डॉ. ऋतु सोनी की। 70 प्रतिशत दिव्यांग होने के बावजूद वे कंप्यूटर साइंस में पीएचडी करने के साथ तीन विषयों में पोस्ट ग्रेजुएशन हैं। वे कई देशों में कंप्यूटर विषय पर रिसर्च कांफ्रेंस का हिस्सा भी बन चुकी हैं। अब न केवल स्वयं सामान्य जीवन जी रही हैं, बल्कि अन्य दिव्यांगों को भी मुख्यधारा से जोड़ने का काम कर रही हैं। उन्होंने बताया कि बचपन में छह माह की उम्र में पोलियो ग्रस्त होने के बावजूद पढ़ने की जिद नहीं छोड़ी। वे अपने समय में नॉर्थ इंडिया की पहली पीएचडी इन कंप्यूटर्स रहीं। उन्होंने पंजाब विश्वविद्यालय से एमएससी फिजिक्स, एमडीयू से एमएससी सॉफ्टवेयर, कुरुक्षेत्र विश्विद्यालय से एमए मास कॉम व कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से कंप्यूटर साइंस में पीएचडी की। इसके बाद 1989 में जीएनजी कॉलेज में बतौर एसिस्टेंट प्रोफेसर अपना करियर शुरू किया। वर्तमान में वे कॉलेज के कंप्यूटर्स डिपार्टमेंट की एचओडी हैं। वे कंप्यूटर पर रिसर्च वर्क को लेकर यूएसए, ग्रीस, रोम, जापान, इटली सहित कई देशों में विभिन्न विश्वविद्यालयों द्वारा आयोजित कॉन्फ्रेंस में भाग ले चुकी हैं। इसके अलावा वह ग्रीस की एथम रिसर्च इंस्टिट्यूट की सदस्य भी हैं। इसके साथ उन्होंने कोरियोग्राफी में भी हाथ आजमाया है। वर्ष-2002 से लेकर 2011 तक उनके कॉलेज की टीम कोरियोग्राफी में अव्वल रही।
शरीर पर था प्लास्टर फिर भी नहीं छोड़ी किताब:
51 वर्षीय डॉ. रितु सोनी ने बताया कि उनकी माता ऊषा सोनी व पिता केवल कृष्ण सोनी ने ही बचपन में जीने की आस जगाई। कभी एक वक्त ऐसा था कि उनका पूरा शरीर बेजान था और दूसरों से बातचीत का सिर्फ आंखें ही जरिया रह गई थीं। जब वह छठी कक्षा में थी, तब ऑपरेशन हुआ, आधे शरीर पर प्लास्टर था। इसके बावजूद उन्होंने हाथ से किताब नहीं छोड़ी। उनके भाई अनिल सोनी व उनकी सहेलियों ने भी उन्हें कभी कोई कमी महसूस नहीं होनी दी।
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दिव्यांगों को बना रही आत्मनिर्भर:
डॉ. रीतू सोनी दिव्यांगों को आत्मनिर्भर बनाने का काम भी कर रही हैं। आरोग्यम् वेलफेयर सोसाइटी का गठन कर दिव्यांगों को मुख्य धारा से जोड़ने का काम किया है। अब से पहले सौ से अधिक दिव्यांगजनों को कृत्रिम अंग दे चुकी हैं। इसके अलावा उनको कंप्यूटर कोर्स भी करवा रही हैं। उन्होंने दिव्यांग जनों से जुड़ी कई मांगें सरकार तक पहुंचाने का काम किया है। उन्होंने जिला की औद्योगिक इकाईयों से कम से कम एक दिव्यांग को नौकरी देने की बात कही।
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