रोहतक। फिंगर प्रिंट विश्वसनीय सबूत है क्योंकि समय के साथ हस्ताक्षर बदल सकते हैं, अंगूठे का निशान नहीं। एडीजे अनिल कौशिक की कोर्ट ने इसी आधार पर निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा और याचिका खारिज कर दी।
कोर्ट को बताया गया था कि देवेंद्र की मां भरपाई का वर्ष 2000 में निधन हो गया तो वे कागजात बनवाने गए। पता चला कि मां की जमीन फर्जी तरीके से ममेरे भाइयों के नाम हो चुकी है। यह खेल 1992 में ही हो गया था। तब, दूसरी महिला को कोर्ट में खड़ा करके मलकियत अपने नाम कराई गई थी। देवेंद्र ने इसे 2013 में कोर्ट में चुनौती दी। फिंगर प्रिंट एक्सपर्ट ने अंगूठों की जांच की तो ये मां के नहीं मिले। दूसरी महिला से इनका मिलान हो गया। इसके बाद निचली अदालत ने 1992 की डिक्री खारिज कर दी। इसी फैसले को दो साल पहले सेशन कोर्ट में चुनौती दी गई थी। इसे कोर्ट ने खारिज कर दिया। ब्यूरो