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निरक्षरों के तिरस्कार की पीड़ा ने बनाया शिक्षा का भगीरथ

Wed, 02 Dec 2015 12:14 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, सोनीपत
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‘शिक्षित समाज-खुशहाल भारत’ का संदेश लेकर एक मुसाफिर लगभग एक साल से यात्रा पर है। सैकड़ों किलोमीटर की यात्रा तय कर चुके फर्रुखाबाद के इस आदित्य कुमार का नाम एशिया बुक, लिम्का बुक आफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज है। इतना ही नहीं वह निशान-ए-इमाम हुसैन अवार्ड जैसे कई पुरस्कार भी वह अपने नाम कर चुका है। यह सारे अवार्ड इसको यूं ही नहीं मिले। उसने अपनी जिंदगी के 20 साल बच्चों को पढ़ाने में खर्च कर दिए हैं। उसने यह मील का पत्थर बिना किसी सरकारी मदद के स्वयं मेहनत-मजदूरी करके तय किया है। आदित्य शान से कहते हैं कि जब उनके पिता ने मेहनत-मजदूरी करके पूरा परिवार पाल लिया तब तो हम अकेले हैं। जिंदगी में कोई खर्चा नहीं है सिर्फ रहने और खाने का। इसीलिए मेहनत-मजदूरी करते हैं और देशभर में शिक्षा की अलख जगा रहे हैं। फर्रुखाबाद का यह लाल मंगलवार को सोनीपत पहुंचा था। अमर उजाला के साथ विशेष बातचीत में आदित्य ने अपने लक्ष्य और जीवन के बारे में बताया।
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एक माह बाद हो जाएगा पूरा साल, साइकिल के साथ
आदित्य ने बताया कि उसने 12 जनवरी 2015 को लखनऊ से अपनी साइकिल यात्रा शुरू की थी। आजीवन गरीब बच्चों को निशुल्क पढ़ाने का संकल्प लेकर अशिक्षा के खिलाफ देशभ्रमण पर निकले हैं। 44 वर्षीय आदित्य ने बताया कि एक माह बाद पूरा एक साल हो जाएगा देशभ्रमण पर निकले। इस दौरान हिमाचल, उत्तराखंड, पंजाब आदि जगहों पर वह जा चुका है, वो भी अपनी साइकिल पर ही।

1995 से लखनऊ में मुफ्त शिक्षा
स्वयं बीएससी तक पढ़े आदित्य ने वर्ष 1995 में मुफ्त शिक्षा देनी शुरू की थी। लखनऊ में उन्होंने बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना शुरू किया था। उनका दावा है कि इस दौरान वह लगभग 20 हजार बच्चों को अपने पैरों पर खड़ा होने लायक बना चुके हैं। उनके द्वारा पढ़ाए हुए बच्चे कई कंपनियों में काम कर रहे हैं, तो कई अधिकारी भी बन चुके हैं। आदित्य ने बताया कि इस दौरान लखनऊ में पढ़ाने वाले तीन-चार लोग और मिल गए, इसीलिए वहां का जिम्मा उनको सौंपकर वह खुद यात्रा पर निकल आए।
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खर्चा खत्म हो जाता है तो करता हूं मेहनत-मजदूरी
बकौल आदित्य वह अपनी देशभ्रमण की इस यात्रा के दौरान किसी अन्य से कोई सहायता नहीं लेते। यात्रा का खर्चा खत्म होता है तो मेहनत मजदूरी कर लेता हूं। जिस भी शहर में हूं, वहां मेहनत-मजदूरी कर लेता हूं। आदित्य ने बताया कि उसके पिता भूपनारायण भी मजदूरी किया करते थे।

तिरस्कार को देख उठाया कदम, शादी भी नहीं की
आदित्य ने बताया कि उसने देखा कि समाज में निरक्षरों को तिरस्कार झेलना पड़ता है। उन्हें लोग हीन दृष्टि से देखते हैं, इसीलिए उसने शिक्षा की अलख जगाने का संकल्प लिया था। तभी संकल्प लिया था कि ताउम्र नि:शुल्क पढ़ाएंगे। इस संकल्प में किसी तरह का व्यवधान नहीं आए, इसीलिए आदित्य ने आज तक शादी भी नहीं की है।

साइकिल वाले गुरुजी के नाम रिकार्ड भी
साइकिल वाले गुरुजी के नाम से प्रसिद्ध आदित्य के नाम कई रिकार्ड और अवार्ड हैं। 2014 में नेशनल रिकार्ड, लिम्का बुक, वंडर बुक, जीनियस बुक, गोल्डन बुक सरीखी रिकॉर्ड बुक में उनका नाम दर्ज है। इसी तरह से उत्तरप्रदेश के राज्यपाल द्वारा निशान-ए-इमाम हुसैन अवार्ड भी दिया गया था। डीडी वन पर स्पेशल रिपोर्ट, आल इंडिया रेडियो, बीबीसी, डिस्कवरी चैनल पर डॉक्यूमेंट्री स्टोरी भी प्रसारित की जा चुकी है। उत्तर-प्रदेश, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश के सीएम ने उन्हें सम्मान पत्र भी दिया था।
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