‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ अभियान चाहे सरकार अब चला रही है, लेकिन चार मरला की 60 वर्षीय नीलम छाबड़ा ने अभियान की परिभाषा को 18 साल पहले ही सार्थक करना शुरू कर दिया था। कपड़ा व्यापारी पति दीनदयाल छाबड़ा की असमय मौत के बाद पोस्ट आफिस की एजेंट बनकर मिली पहली 100 रुपये की कमाई ने उनके अंदर इतना जोश भरा कि उसने तीनों बेटियों को पढ़ा-लिखाकर अफसर बना दिया। मंगलवार रात उस साहसी मां का बेटी के घर में देहांत हो गया। बुधवार सुबह तीनों बहनों ने न केवल अपनी मां की अर्थी को कंधा दिया, बल्कि अंतिम संस्कार की सभी रस्में पूरी की। नीलम की हिम्मत और सोच को आज पूरा शहर सलाम कर रहा है। साथ में कह रहा है कि बेटियां बेटों से कम नहीं हैं, यह नीलम छाबड़ा ने साबित करके दिखा दिया है। चार मरला निवासी रोमा ने अमर उजाला से बातचीत करते हुए बताया कि उसका परिवार मूलरूप से पाकिस्तान के नजदीक मुल्तान के पास का रहने वाला है। आजादी के बाद दादा सोनीपत आकर बस गए। यहां पर पिता दीनदयाल छाबड़ा ने गुरुद्वारा रोड पर कपड़े की दुकान शुरू की। परिवार में तीन बेटियों ने जन्म लिया। रोमा ने बताया कि माता-पिता ने कभी भी यह महसूस नहीं होने दिया कि परिवार में बेटा होना चाहिए। हर समय यहीं कहती थी कि तुम ही मेरे बेटे हो।
मैं 8वीं में थी तब पिता छोड़ गए थे साथ
28 वर्षीय रोमा ने बताया कि 1998 में पिता दीनदयाल छाबड़ा का बीमारी के चलते देहांत हो गया। बड़ी बहन 32 वर्षीय गीतू ने बीए में दाखिल लिया था, जबकि कंचन 10वीं में थी। उसने आठवीं पास की थी। मां पर घर चलाने का संकट आ गया था।
घर-घर जाकर मां ने खोले अकाउंट
पिता का अचानक देहांत होने से परिवार के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया। मां नीलम ने हौसला बढ़ाया, कहा कि तुम लोग अपनी पढ़ाई जारी रखो। घर चलाने के लिए मां ने डाक विभाग में एजेंट की नौकरी कर ली। घर-घर जाकर लोगों के अकाउंट खोलने लगी। पहली कमाई 100 रुपये मिली तो मानो मां को हमें पढ़ाने की संजीवनी मिल गई हो।
मां की हिम्मत देख बहनों ने ठान लिया होना है कामयाब
बकौल रोमा, गीतू और कंचन ने पढ़ने के साथ-साथ ट्यूशन पढ़ाना शुरू कर दिया। परिवार अपने पैरों पर खड़ा हो गया। 2003 में गीतू की शादी दिल्ली के जूता कारोबारी रिशु सेठी से हुई। जो परिवार का दामाद नहीं, परिवार का बेटा बनकर आए।
...जब जीजा ने किया साली का कन्यादान
छाबड़ा परिवार के मुताबिक 2010 में कंचन ने भी एजूकेशन पूरी कर ली। उसकी शादी भी दिल्ली के एक परिवार में हुई। रिशु ने खुद ही कंचन का अपने हाथों से कन्यादान किया।
..मरते वक्त दामाद को बोली, बेटा तूने इतनी सेवा की, शायद मेरा असली बेटा भी न करता
रोमा ने बताया 2013 में उसने भी पढ़ाई पूरी कर ली और साफ्टवेयर इंजीनियर बन गई। साथ में कुरुक्षेत्र निवासी विपुल चुघ से शादी कर ली। वह भी साफ्टवेयर इंजीनियर है। दोनों फिलहाल गुड़गांव में काम करते हैं। तीनों बहनों की शादी के बाद मां नीलम छाबड़ा सोनीपत में अकेली रह गईं। कई बार उन्हें बुलाया। कहती थी कि बेटी जब तुम्हारा बेटा होगा तब गुड़गांव आऊंगी। बेटे के जन्म के बाद से तीन महीने तक नीलम गुड़गांव में ही रह रही थी। मरते वक्त उसके पति विपुल को इतना ही कहा कि बेटा तूने इतनी सेवा की, जितना मेरी कोख से जन्म लेने वाला बेटा भी न करता।
पूरे समाज को नीलम व उसकी बेटियों पर गर्व
समाजसेवी और पड़ोसी रवि गांधी का कहना है कि नीलम छाबड़ा और उसकी बेटियों ने साबित कर दिया कि बेटियां किसी भी मायने में बेटों से कम नहीं है। बस सोच बदलकर उन्हें पढ़ाने व आगे बढ़ाने की जरूरत है। नीलम और उसकी बेटियों गीतू, कंचन व रोमा पर समाज के लोगों को गर्व है।