सोनीपत। कृषि कानूनों को रद्द करने की मांग को लेकर आंदोलन कर रहे किसानों के तेवर तल्ख होते जा रहे हैं। किसानों ने साफ कर दिया है कि बातचीत बहुत हो चुकी है और अब कृषि कानून रद्द करने का फैसला चाहिए। अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति के प्रतिनिधियों ने कहा कि वह शनिवार को बैठक में जरूर जाएंगे, लेकिन वहां केवल एक ही बात रखी जाएगी कि कृषि कानून रद्द करने से कम कुछ मंजूर नहीं होगा। अगर किसी तरह की शर्त रखी गई तो फिर आउटर बाईपास समेत पूरी दिल्ली को किसान जाम करेंगे। वहीं, 8 दिसंबर को भारत बंद का एलान किया गया। इसके साथ ही देशभर के टोल फ्री किए जाएंगे और सभी टोल पर किसान जमा होंगे। देशभर में शनिवार को गांव, ब्लॉक, जिला स्तर पर सरकार व कारपोरेट घरानों का पुतला फूंकने का आह्वान किया है तो 7 दिसंबर को खिलाड़ी अपने सम्मान लौटाएंगे।
किसान नेता गुरनाम सिंह चढूनी, डॉ. दर्शनपाल, जोगेंद्र यादव, सुनीलम, योगेंद्र यादव, शिवकुमार कक्काजी, बलबीर सिंह, युद्धबीर सिंह ने कहा कि आठ दिसंबर को भारत बंद का फैसला लिया गया है। इसमें देशभर का किसान एकजुट होगा और बंद को सफल बनाया जाएगा। उन्होंने बताया कि उत्तर प्रदेश का किसान फरीदाबाद-गाजियाबाद, राजस्थान का किसान गुरुग्राम और हरियाणा-पंजाब का किसान टीकरी व सिंघु बॉर्डर तक पहुंच चुका है। वहीं अब अगला पड़ाव दिल्ली में होगा। अब यह सरकार को तय करना है कि वह देश बंद कराना चाहती है या मांग मानना चाहती है।
आज देशभर में फूंके जाएंगे पुतले
किसान नेताओं ने कहा कि 5 दिसंबर को हर गांव, ब्लॉक व जिला में कृषि कानूनों का विरोध करते हुए सरकार व कारपोरेट घरानों के पुतले फूंके जाएंगे। इस तरह किसान प्रतिनिधि अंदर बैठक में अपनी मांग रखेंगे तो बाहर पुतले फूंककर सरकार तक आवाज पहुंचाएंगे। उनका मानना है कि पुतला फूंकने का असर ज्यादा होगा, जिससे सरकार को पता चलेगा कि इन कानूनों के खिलाफ कितने किसान हैं। उन्होंने कहा कि 7 दिसंबर को खिलाड़ी व कलाकार सम्मान वापस करेंगे।
अब जनता व कारपोरेट के बीच लड़ाई
किसान नेता गुरनाम सिंह चढूनी ने कहा कि सरकार किसानों की मांगे मानने में देर कर रही है। देश भुखमरी के कगार पर पहुंचता जा रहा है। इसलिए जनता व कारपोरेट के बीच लड़ाई शुरू करनी होगी। जितने लोग दिल्ली नहीं आ सकते, वह अपने यहां सरकार व कारपोरेट का पुतला फूंककर उसका वीडियो वायरल करेंगे। आंदोलन में किसानों के साथ अब गैर-किसान संगठन भी आगे आ रहे हैं। हरियाणा रोडवेज वर्कर्स यूनियन, सीटू, आशा वर्कर्स यूनियन व छात्र संगठनों के पदाधिकारियों ने तीनों कृषि कानून वापस लेने की मांग की।