रोहतक। पीजीआईडीएस (पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ डेंटल साइंस) में मैंडिबुलर फ्रेक्चर्स पर हुए अध्ययन को यूएचएस में हुए शोध में शामिल किया गया है। पीजीआईडीएस का नाम दुनिया की 50 शोध में शामिल हो गया है। इस उपलब्धि के लिए कुलपति डॉ. एचके अग्रवाल ने डॉ. वीरेंद्र, डॉ. अमरीश भगोल व डॉ. राहुल की सराहना की है।
कुलपति ने कहा कि डॉ. अमरीश भगोल, डॉ. वीरेंद्र व डॉ. राहुल ने मैंडिबुलर फ्रेक्चर्स पर किए गए अध्ययन को प्रतिष्ठित अमेरिकन जर्नल ऑफ ओरल एंड मैक्सिलोफेशियल सर्जरी ने दुनिया के शीर्ष 50 सबसे अधिक उद्धृत अध्ययनों में शामिल किया है। यह डेंटल कॉलेज के चिकित्सकों व पीजीआई के लिए सराहनीय है। उन्होंने कहा कि हमें इन चिकित्सकों से प्रेरणा लेते हुए अधिक से अधिक रिसर्च करनी चाहिए। कॉलेज प्राचार्य डॉ. संजय तिवारी के प्रयास से यह संभव हुआ है।
सड़क हादसों में आम है मैंडिबल चोटें
डॉ. अमरीश भागोल ने कहा कि दुनिया भर में सड़क यातायात दुर्घटनाओं में वृद्धि हो रही है। इनमें चेहरे की हड्डियों, विशेष रूप से मैंडिबल की चोटें आम हैं। मैंडिबुलर फ्रेक्चर्स मैक्सिलोफेशियल चोटों में सबसे प्रमुख हैं। रोगियों के कार्यात्मक पुनर्वास, सौंदर्यशास्त्र और जीवन की गुणवत्ता के लिए यह गंभीर चुनौतियां पेश करते हैं। शोध का योगदान इस महत्वपूर्ण क्षेत्र में वैज्ञानिक समझ को बढ़ाने के साथ बेहतर रोगी परिणामों, उन्नत सर्जिकल प्रोटोकॉल और वैश्विक स्वास्थ्य देखभाल रणनीतियों में भी सहायक है।
मैंडिबुलर फ्रेक्चर्स के लिए एक व्यापक रूप से प्रशंसित वर्गीकरण प्रणाली विकसित की है। इसे अमेरिकन जर्नल ऑफ ओरल एंड मैक्सिलोफेशियल सर्जरी में प्रकाशित किया गया है। यह प्रणाली अब विश्वभर के सर्जन नियमित रूप से उपयोग कर रहे हैं। इसके तहत मुंह के निचला जबड़ा 15 एमएम से कम टूटा या हिला हो तो ऑपरेशन की जरूरत ही नहीं है। इससे अधिक चोट पर ही ऑपरेशन किया जाता है। इससे मरीज को भी राहत मिलती है।
वर्जन
कुलपति का प्रयास संस्थान में रिसर्च को बढ़ावा देने का है। इसीलिए पांच करोड़ रुपये मंजूर किए गए हैं। संस्थान के चिकित्सक व विद्यार्थी बेहतर कर रहे हैं। इससे संस्थान की छवि भी बेहतर बन रही है।
- डाॅ. संजय तिवारी, प्राचार्य, पीजीआईडीएस