सोनीपत। कारगिल शहीद बरोदा निवासी नायक सतबीर सिंह की पत्नी शीला देवी वो आखिरी पत्र आज भी संजो कर रखे हैंं। उन्होंने कहा, पत्र में सतबीर ने लिखा था कि गेहूं की कटाई शुरू होने से पहले गांव आ जाऊंगा। छुट्टी मंजूर हो गई है लेकिन जिस दिन से छुट्टी मंजूर हुई थी, उसके एक दिन पहले दुश्मनों से मोर्चा लेते हुए बलिदान हो गए। हमें सेना के अफसरों से उनकी शहादत की सूचना मिली थी।
सोनीपत के गांव बरोदा निवासी सतबीर सिंह मोर 19 वर्ष की आयु में 24 दिसंबर 1987 को सेना में भर्ती हुए थे। वे सेना की जाट रेजिमेंट में नायक के पद पर भर्ती हुए थे। देशभक्ति का जज्बा बचपन से ही उनके मन में था। कारगिल युद्ध में पूरी जांबाजी के साथ उन्होंने मुकाबला किया। अंतिम सांस तक देश की रक्षा का फर्ज निभाते हुए 31 मार्च 1999 को पाकिस्तानी फौज से लोहा लेते हुए सतबीर सिंह मोर शहीद हो गए।
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पत्र का जिक्र करते ही भावुक हो जाती हैं पत्नी शीला
शहीद सतबीर सिंह मोर की पत्नी शीला देवी ने कहा कि उन्हें गर्व है कि वे शहीद की पत्नी हैं। उनके पति ने देश की रक्षा करते हुए प्राणों की आहुति दी। उन्होंने बताया कि तब मोबाइल फोन व टेलीफोन नहीं थे। हमेशा पति की चिट्ठी के आने का इंतजार रहता था। शहादत के 15 दिन पहले ही उनकी चिट्ठी मिली थी, जिसमें उन्होंने गेहूं की कटाई शुरू होने से पहले आने की बात कही थी। छुट्टी मंजूर हो गई थी, जिस दिन उन्हें घर पहुंचना था, ठीक एक दिन पहले ही वे शहीद हो गए।
सतबीर सिंह की शहादत के समय उनकी बड़ी बेटी बीना की 7 साल की और बेटे सतपाल की उम्र 4 साल व दूसरे बेटे प्रदीप की उम्र 2 साल थी। पिता से प्रेरित होकर बड़े बेटे सतपाल सेना में भर्ती होकर देश की रक्षा कर रहे हैं। गांव के प्रवेश द्वार सतबीर सिंह के नाम से है, लेकिन शहीद पार्क नहीं बन पाया है।