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दिल्ली की सीमाओं पर आंदोलन खड़ा करके मैदान में किसान नेता, अब उत्तर भारत में मजबूती को जुटे

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सरकार के साथ बंद पड़ा बातचीत का रास्ता खोलने के लिए किसान नेताओं ने रणनीति को पूरी तरह से बदल दिया है। जहां पहले संयुक्त किसान मोर्चा आंदोलन की ज्यादातर रणनीति कुंडली बॉर्डर पर रहकर बनाता था,वहीं अब दिल्ली की सीमाओं कुंडली, गाजीपुर व टीकरी पर दोबारा से आंदोलन खड़ा करके किसान नेता मैदान में उतर गए हैं। क्योंकि हरियाणा, पंजाब और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में आंदोलन को मजबूती मिल गई है। अब वह उत्तर भारत में आंदोलन को मजबूत करने में जुटे हैं। जिससे सरकार के खिलाफ माहौल तैयार करके दबाव बनाया जा सके। सरकार को बातचीत का रास्ता खोलने के लिए मजबूर किया जा सके। इसके लिए ही किसान नेताओं ने अलग-अलग राज्यों का रुख कर लिया है। वहां सरकार के खिलाफ माहौल बनाना भी शुरू कर दिया गया है।
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कृषि कानून रद्द कराने की मांग को लेकर आंदोलन कर रहे किसानों व सरकार के बीच 11 दौर की बातचीत हो चुकी है। एक बार गृहमंत्री अमित शाह के साथ भी बातचीत हुई थी। किसानों व सरकार के बीच आखिरी बैठक 22 जनवरी को हुई थी। पहले बातचीत का सिलसिला लगातार चल रहा था। लेकिन अब 15 दिन से ज्यादा समय हो चुके हैं और किसानों व सरकार के बीच बातचीत नहीं हुई है। जहां ट्रैक्टर परेड के दौरान दिल्ली में बवाल के कारण कई दिनों तक आंदोलन टूटता देखकर सरकार बातचीत नहीं करना चाहती थी और किसान अपने टूटते आंदोलन को खड़ा करने में लगे हुए थे, वहीं अब दोबारा से आंदोलन मजबूत हो गया है। लेकिन सरकार चाहती है कि किसान बातचीत के लिए आगे आकर खुद पहल करें। जबकि किसान चाहते हैं कि उनको सरकार प्रस्ताव भेजे तो वह बातचीत के लिए जाएंगे। इस तरह से एक-दूसरे के अड़े होने से बातचीत का रास्ता नहीं खुल रहा है। बातचीत के रास्ते को खोलने को लिए दिल्ली की सीमाओं कुंडली, गाजीपुर, टिकरी पर आंदोलन मजबूत करके किसान नेताओं ने मैदान में उतरना शुरू कर दिया है।
किसान नेताओं को लगता है कि पंजाब, हरियाणा व पश्चिमी उत्तर प्रदेश में आंदोलन पहले से ज्यादा मजबूत हो गया है, लेकिन अन्य राज्यों के किसान भी दोबारा आंदोलन से जोड़कर सरकार के खिलाफ माहौल तैयार किया जाए। उससे सरकार पर दबाव बनने से बातचीत का रास्ता खुलेगा। यही कारण है कि जहां एक सप्ताह पहले तक सभी किसान नेता बॉर्डर पर डेरा जमाए रहते थे, वह अब मैदान में उतरकर किसानों के बीच पहुंच रहे हैं। यह कोई एक नेता नहीं, बल्कि राकेश टिकैत, गुरनाम सिंह चढ़ूनी, बलबीर सिंह राजेवाल, जगजीत सिंह दल्लेवाल, दर्शनपाल, युद्धवीर सिंह, अभिमन्यु कोहाड़ सहित सभी बड़े नेता अलग-अलग राज्यों में किसानों के बीच पहुंच रहे हैं। इनकी नजर उत्तर भारत के राज्यों पर टिकी है, जिनमें उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तराखंड सबसे अहम हैं तो बिहार, महाराष्ट्र, केरल, कर्नाटक तक भी यह पहुंच रहे हैं। यही कारण है कि किसान आंदोलन की रणनीति बदलती दिख रही है। जिस तरह का माहौल बना हुआ है, उसे देखते हुए आंदोलन को बढ़ाने के लिए अंदरूनी रणनीति पर ज्यादा जोर दिया जा रहा है।
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प्रधानमंत्री ने कई दिन पहले बातचीत करने की बात कही थी, लेकिन हमारे पास सरकार की ओर से कोई प्रस्ताव नहीं आया है। अगर सरकार को बातचीत करनी है तो हम दिल्ली की सीमा के पास हैं और सरकार प्रस्ताव भेजकर बातचीत के लिए बुला सकती है। जिस तरह के हालात हैं, उससे लग रहा है कि सरकार ही बातचीत नहीं करना चाहती है। क्योंकि हम पहले भी कह चुके हैं और अब भी कह रहे हैं कि हमारी तरफ से बातचीत का रास्ता कभी बंद नहीं हुआ है। अब हम अलग-अलग राज्यों में लगातार किसानों के बीच जा रहे हैं और उनको कृषि कानूनों के नुकसान के बारे में बताकर आंदोलन में जोड़ा जा रहा है। इसका बड़ा असर भी देखने को मिल रहा है। बॉर्डर पर किसान पहुंच रहे हैं तो वह अपने यहां रहकर भी आंदोलन कर रहे हैं। गुरनाम सिंह चढ़ूनी, अध्यक्ष भाकियू हरियाणा।
सरकार को बातचीत करनी होती तो पीएम के बयान के बाद अभी तक प्रस्ताव भेजकर बातचीत कर चुके होते। सरकार के लोगों का चेहरा सार्वजनिक तौर पर कुछ अलग होता है और उसके बाद उनका चेहरा बदल जाता है। वह हमेशा बातचीत करने के लिए तैयार रहने की बात कहते हैं, लेकिन किसान तभी बातचीत करेंगे, जब सरकार की ओर से प्रस्ताव मिलेगा। तब तक आंदोलन तेज होता रहेगा और यह सरकार को खुद भी दिख रहा है कि किस तरह से आंदोलन बढ़ता जा रहा है। अगर सरकार यह सोचती है कि आंदोलन लंबा होने से कमजोर हो जाएगा तो यह उसकी सबसे बड़ी भूल है। अभिमन्यु कोहाड़, सदस्य संयुक्त किसान मोर्चा।
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