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किसान व सभी संगठनों को एकजुट रखने पर जोर, सरकार का रुख देख रोजाना बनाते है रणनीति

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अंकित चौहान
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सोनीपत। कृषि कानूनों का विरोध करते हुए किसान 27 नवंबर से नेशनल हाईवे 44 के सिंघु बॉर्डर पर डटे हुए हैं। किसानों के नेशनल हाईवे जाम करने से केवल सरकार की चिंता ही नहीं बढ़ी है, बल्कि जिस तरह से आंदोलन बड़ा होता जा रहा है और पंजाब के साथ ही हरियाणा, यूपी, राजस्थान समेत अन्य राज्यों से किसान जुटने शुरू हो गए हैं। उससे किसान व संगठनों को एकजुट रखने की चिंता बढ़ी है। क्योंकि किसान संगठनों को लगता है कि एकजुटता खत्म होते ही आंदोलन कमजोर होना तय है और इसलिए ही किसान सभी संगठनों को एकजुट रखने पर ज्यादा जोर दिया जा रहा है। इसके साथ ही किसान संगठन अब पहले से कोई रणनीति नहीं बना रहे हैं। बल्कि जिस तरह से सरकार का रुख होता है, उसको देखकर ही रोजाना रणनीति बनाई जा रही है।
नेशनल हाईवे 44 के सिंघु बॉर्डर पर किसानों ने डेरा डाला हुआ है और वहां चार दिन पहले तक केवल पंजाब के किसान व वहां के करीब 30 संगठन दिख रहे थे। समय बीतने के साथ ही वहां किसान बढ़ते जा रहे हैं और अब पंजाब के साथ ही हरियाणा, यूपी, राजस्थान के किसान भी पहुंच गए हैं। हरियाणा के करीब 18 किसान संगठन, यूपी की भाकियू के अलावा मध्य प्रदेश व राजस्थान के किसान नेता भी वहां मौजूद है। इस तरह आंदोलन बड़ा होता जा रहा है और इसको देखकर किसानों का हौसला भी बढ़ रहा है। आंदोलन अभी तक जिस तरह से चल रहा है, उसको देखकर किसान संगठन भी काफी संतुष्ट है। लेकिन किसान संगठनों का पूरा जोर इस समय एकजुट रहने पर है, क्योंकि उनको डर है कि एकजुटता खत्म होते ही आंदोलन कमजोर पड़ जाएगा। इसके लिए ही रोजाना सुबह को जब धरनास्थल पर भाषण शुरू होता है तो उस भाषण में सबसे ज्यादा जोर एकजुट रहने पर होता है। आंदोलन को कोई केवल पंजाब का बताता है तो पंजाब के किसान संगठन तुरंत ही मंच से साफ कहते है कि यह केवल पंजाब का नहीं, बल्कि पूरे देश का आंदोलन है। अन्य प्रदेशों के किसान नेताओं के नाम भी गिनाए जाते हैं और उनको मंच से लेकर बैठक व अन्य जगहों पर भी अग्रिम पंक्ति में रखा जाता है। किसानों के बीच भी यह संदेश दिया जा रहा है कि पंजाब, हरियाणा, यूपी, राजस्थान सभी जगह का किसान एक हैं और किसान जबतक एकजुट होगा, तबतक सरकार दबाव में रहेगी।
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सरकार का रुख देखकर रोजाना तय हो रही आंदोलन की रणनीति
कृषि कानूनों के विरोध में जब आंदोलन की घोषणा की गई तो उस समय किसान संगठन व किसानों की केवल एक ही रणनीति थी कि किसी तरह से दिल्ली के रामलीला मैदान या जंतर मंतर पर जाकर धरना देना है, लेकिन जिस तरह से रोजाना सरकार का रुख किसान संगठन देखते हुए, उसी तरह से अपना कड़ा रुख अपनाकर आंदोलन की नई रणनीति रोजाना तय करते हैं। जहां पहले दिल्ली जाने की जगह नेशनल हाईवे जाम करने की रणनीति बनाई, फिर दिल्ली की पांच नेशनल हाईवे से मोर्चाबंदी की रणनीति बनी तो अब सभी संपर्क मार्ग रोकने की रणनीति बन गई है। जिसके तहत मंगलवार को सभी संपर्क मार्ग बंद करने शुरू कर दिए गए है।
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खाना बनाकर, ताश खेलकर, हुक्का पीकर व गाना सुनकर आराम से बिता रहे दिन
किसानों की दिनचर्या की शुरुआत सुबह दैनिक कार्यों से होती है। उनसे निवृत्त होकर किसान खुद ही नाश्ता बनाकर खाते हैं और उसके बाद धरनास्थल पर पहुंच जाते हैं। वहां से आकर खाना बनाते हैं और खाना खाकर आराम करते हैं। इस बीच ही समय मिलता है तो ताश खेलकर, हुक्का पीकर, गाना सुनकर आराम से समय बिताते हैं। युवा किसान अपना मनोरंजन करने के लिए ज्यादा गाने सुनते हैं।
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यह पूरे देश के किसानों का आंदोलन है और इस समय किसानों को एकजुट देखकर सरकार परेशान है। सरकार को किसी भी हालत में कृषि कानूनों को रद्द करना पड़ेगा। इससे कम में किसान मानने को तैयार नहीं हैं। जब तक कृषि कानून रद्द नहीं होंगे, तबतक आंदोलन चलता रहेगा और किसान कड़ा फैसला भी लेने को तैयार हो रहे हैं।
- गुरनाम सिंह चढूनी, अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति, कार्यकारिणी सदस्य
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