सोनीपत। सरकार के रुख को देखते हुए किसानों में नाराजगी बढ़ने लगी है। जिससे किसान नेताओं ने आंदोलन को तेज करने के लिए फिर से कड़े फैसले लेने शुरू कर दिए है। जहां सांसदों के आवास पर प्रदर्शन करने के अलावा विपक्षी पार्टियों के सांसदों को चेतावनी पत्र दिए जाएंगे, वहीं किसान संगठनों के नेता संसद कूच भी करेंगे।
किसानों के इन फैसलों को देखते हुए सरकार के साथ फिर से टकराव के हालात बनने लगे हैं। क्योंकि युवाओं को रोकना बड़ी चुनौती होगी तो संसद पर जाने को लेकर भी बवाल हो सकता है। किसानों की नाराजगी का मुख्य कारण सरकार से लंबे समय से बातचीत नहीं होना माना जा रहा है।
कृषि कानून रद्द करने की मांग को लेकर किसान साढ़े सात महीने से कुंडली बॉर्डर पर डटे हुए हैं। इस बीच किसानों व सरकार में 11 दौर की बातचीत हो चुकी है तो गृहमंत्री अमित शाह भी किसानों से वार्ता कर चुके हैं। इसके बावजूद कोई हल अभी तक नहीं निकल सका है, लेकिन यह जरूर है कि सरकार व किसानों के बीच बैठक का दौर लगातार जारी था।
किसानों व सरकार के बीच आखिरी बैठक 22 जनवरी को हुई थी और उसके बाद से बातचीत का रास्ता बंद पड़ा है। जहां कृषि मंत्री नरेंद्र तोमर कई बार कह चुके हैं कि सरकार बातचीत करने के लिए तैयार है तो किसान भी बातचीत शुरू करने के लिए अपनी तरफ से पीएम नरेंद्र मोदी को पत्र भेज चुके हैं। इसके बावजूद सरकार की तरफ से अभी तक बातचीत के लिए कोई प्रस्ताव नहीं आया है और किसान चाहते हैं कि सरकार से पहले की तरह प्रस्ताव मिलने के बाद ही बातचीत के लिए जाएंगे। लेकिन सरकार के इस रुख को देखते हुए किसानों की नाराजगी बढ़ गई है और इसलिए ही किसानों ने दोबारा से बड़े फैसले लेने शुरू कर दिए हैं, ताकि सरकार पर दबाव बनाकर बातचीत का रास्ता खोला जा सके। किसानों का सांसदों के आवास पर प्रदर्शन व संसद कूच करने का फैसला सरकार पर दबाव बनाने की रणनीति के तहत ही माना जा रहा है। लेकिन किसानों के इस फैसले से दोबारा टकराव के आसार बनने लगे हैं। इसलिए ही अब हर किसी की नजर इस पर टिकी है कि संसद कूच से पहले सरकार व किसानों के बीच बातचीत होती है या नहीं।
युवाओं को संभालना भी किसान मोर्चा के लिए चुनौती
किसान आंदोलन मे युवाओं की भागीदारी जहां पहले काफी कम हो गई थी, वहीं दोबारा से युवाओं को आंदोलन से जोड़ने के लिए अभियान चलाया गया और उसका असर भी दिखाई दिया है। आंदोलन के शुरुआती दौर की तरह भले ही युवाओं को नहीं जोड़ा जा सका हो, लेकिन वहां से लौटे काफी युवाओं को दोबारा वापस लाने में कुछ कामयाबी जरूर मिली है। ऐसे में युवाओं को संभालना भी किसान मोर्चा के लिए चुनौती है, क्योंकि संसद कूच के लिए युवा पहले ही हंगामा कर चुके हैं और किसान नेताओं के साथ युवा भी संसद कूच का फैसला ले सकते हैं।
वर्जन
किसान पिछले साढ़े सात महीने से दिल्ली के बॉर्डर पर बैठे हुए हैं। सरकार बातचीत शुरू करने का बयान जरूर देती है, लेकिन किसानों की बात सुनने को तैयार नहीं है। ऐसे में किसानों को कड़े फैसले लेने पड़ रहे हैं। हम नहीं चाहते हैं कि किसी तरह का बवाल हो और यह साफ कर दिया है कि आंदोलन पूरी तरह से शांति के साथ चलाया जाएगा। इसके लिए सभी से अपील की गई है। सरकार को जल्द ही किसानों की बात मानकर आंदोलन को खत्म कराना चाहिए।
- गुरनाम सिंह चढूनी, सदस्य संयुक्त किसान मोर्चा