सोनीपत। नगर निगम चुनाव को लेकर शहर की राजनीति में एक बार फिर से हलचल तेज हो गई है। भले ही चुनाव मार्च में होने की संभावना जताई जा रही है लेकिन उससे पहले 22 जनवरी को मेयर पद के आरक्षण को लेकर होने वाला ड्रॉ राजनीतिक दलों और संभावित दावेदारों के लिए सबसे निर्णायक पड़ाव माना जा रहा है।
पंचकूला में होने वाले ड्रॉ से यह स्पष्ट होगा कि मेयर अनारक्षित रहेगा या किसी वर्ग के लिए आरक्षित किया जाएगा। इसी फैसले पर पूरा चुनावी गणित निर्भर करेगा। मेयर पद को लेकर भाजपा और कांग्रेस दोनों ही दलों में हलचल तेज है।
भाजपा निवर्तमान मेयर राजीव जैन पर एक बार फिर से दांव लगाने की तैयारी में है तो कांग्रेस की तरफ से कमल दिवान को प्रमुख दावेदार माना जा रहा है। हालांकि, आरक्षण का फैसला इन दोनों ही चेहरों की सियासी राह आसान या मुश्किल बना सकता है।
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि यदि मेयर पद महिला या किसी आरक्षित वर्ग के लिए चला गया तो मौजूदा दावेदारों की रणनीति बदलनी पड़ेगी। ऐसे में दोनों प्रमुख दलों को नए चेहरों की तलाश करनी होगी। यही कारण है कि कई संभावित उम्मीदवार फिलहाल खुलकर सामने आने के बजाय ड्रॉ का इंतजार कर रहे हैं। अंदरखाने बैठकों और समीकरणों का दौर जरूर जारी है, लेकिन कोई भी नेता अभी पत्ते खोलने को तैयार नहीं दिख रहा।
अनारक्षित रहा तो राजीव जैन को मिल सकता है मौका
भाजपा के भीतर यह माना जा रहा है कि यदि मेयर पद अनारक्षित रहता है तो निवर्तमान मेयर राजीव जैन प्रबल दावेदार होंगे। पार्टी का एक वर्ग उनके कार्यकाल को सक्रिय और विकासोन्मुख मानता है। ऐसे में ड्रॉ के बाद भाजपा की रणनीति पूरी तरह स्पष्ट होने की उम्मीद है।
कांग्रेस को अवसर की तलाश
कांग्रेस के लिए यह चुनाव शहरी क्षेत्रों में पकड़ मजबूत करने का अहम मौका माना जा रहा है। कमल दीवान पहले भी मेयर उपचुनाव में किस्मत आजमा चुके हैं, जहां उन्हें 34749 मतों से हार का सामना करना पड़ा था। इसके बावजूद पार्टी में उन्हें एक सक्रिय और संघर्षशील नेता के रूप में देखा जाता है। कांग्रेस को उम्मीद है कि बदले हुए हालात में वह बेहतर प्रदर्शन कर सकती है।
नए चेहरों की दावेदारी भी संभव
ड्रॉ का निर्णय केवल पुराने दावेदारों की स्थिति ही तय नहीं करेगा, बल्कि नए चेहरों के लिए भी सियासी दरवाजे खोल सकता है। सीट आरक्षित होती है तो भाजपा, कांग्रेस के साथ-साथ निर्दलीय और अन्य दलों के कई नए नाम सामने आ सकते हैं। शहरी मतदाताओं के बीच सफाई, सडक़, पानी और सीवर जैसे स्थानीय मुद्दे इस बार भी चुनावी बहस के केंद्र में रह सकते हैं।