संवाद न्यूज एजेंसी
ओढां। कैंसर को लाइलाज बीमारी माना जाता है लेकिन दृढ़ इच्छाशक्ति, सही दिनचर्या और नियमित इलाज से इस बीमारी को भी हराया जा सकता है। गांव नूहियंावाली की रेशमी देवी, सोना देवी आैर सावित्री देवी जैसी कई महिलाएं हैं िजन्होंने इस बीमारी को हराकर इसे साबित किया है।
जब इन महिलाआाें को यह पता चला वे सर्वाइकल कैंसर से पीडि़त हैं तो उन्होन हार नहीं मानी। उलटे कैंसर को हराने को ठान लया। इस बीमारी से जूझतीं महिलाओं ने विश्व कैंसर दिवस पर अपने अनुभव साझा किए। गांव नुहियांवाली की 62 वर्षीय रेशमी देवी ने बताया कि कार्य करते उसे गुम चोट लगी थी। समय बीतता गया और यह गुम चोट गंभीर बीमारी में बदल गई। बीकानेर में जांच के बाद चिकित्सकों ने कैंसर बता दिया। यह बीमारी उस समय प्रथम स्टेज की थी। एक बार तो कैंसर का नाम सुनकर सब डर गए, लेकिन उसके बाद खुद को हिम्मत बंधाते हुए इससे लड़ने का ठाना। करीब दो माह तक अस्पताल में रहकर उन्होंने अपना उपचार करवाया और अब वो ठीक हैं। ठीक होने के बाद अब उन्हें किसी कैंसरग्रस्त मरीज के बारे में पता चलता है तो वो उनका साहस बढ़ाती हैं। वे कहती है- जीवनशैली में बदलाव कर कैंसर को रोका जा सकता है।
नुहियांवाली की ही 72 वर्षीय सोना देवी ने बताया कि वह सर्वाइकल कैंसर से पीड़ित थी। इसका पता उन्हें तब पता चला जब तकलीफ ज्यादा बढ़ी। बीमारी प्रथम स्टेज पर थी। इसके बाद उन्होंने उपचार लिया और अब वो बिल्कुल स्वस्थ हैं। इस बीमारी का पता चलने पर परिजनों ने उनका हौसला बढ़ाया।
51 वर्षीय सावित्री देवी ने बताया कि उन्हें 2014 में सर्वाइकल कैंसर हो गया था। पता चलने पर उन्होंने इसका उपचार शुरू करवा दिया। उन्हें इस बीमारी से ठीक होने में 6 माह लग गया। एक बार तो सुनकर डर लगा कि अब क्या होगा, लेकिन जब सबने हौसला बढ़ाया तो लगा कि इसके खिलाफ जंग जीत ली।
यह बोले विशेषज्ञ
बठिंडा के कैंसर विशेषज्ञ डॉ. अनुज बंसल का कहना है कि पिछले कुछ समय से इस बीमारी के केसों में काफी बढ़ोतरी हुई है। मरीज के लिए बीमारी का समय काफी पीड़ादायक होता है। इस रोग में हौसला ढाल का काम करता है। यदि रोग का निदान व उपचार प्रारंभिक अवस्थाओं में किया जाए तो इसका पूर्ण उपचार संभव है। यदि हम अपनी जीवनशैली में कुछ परिवर्तन करने को तैयार हों तो 60 प्रतिशत मामलों में कैंसर होने से रोका जा सकता है।
अनारकली। संवाद
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