गांव चौटाला में पहली बार एक महिला सरपंच बनी हैं। इसके साथ ही नई सोच भी पनपी है। नवनिर्वाचित सरपंच निर्मला देवी का कहना है कि वह चौटाला के हकों के लिए घूंघट छोड़ देगी। अन्य महिलाओं को भी इस कल्चर को खत्म करके अधिकारों के लिए खड़े होने का आह्वान करेगी।
सीएम प्रकाश सिंह बादल के जद्दी हलके लंबी की कुड़ी को पूर्व मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला के पैतृक गांव चौटाला की चौधर मिली है। पंजाब की संस्कृति में पली-बढ़ी यह कुड़ी नेताओं के गांव में घूंघट कल्चर को समाप्त करके महिलाओं में क्रांति लाना चाहती है। नवनिर्वाचित सरपंच निर्मला देवी का कहना है कि वह जो एक बार ठान लिया, उसे पूरा करके ही दम लेती है।
यूं मिली चौधर
मूल रूप से गांव लंबी (श्री मुक्तसर साहिब) की रहने वाली निर्मला देवी ने यह कभी नहीं सोचा था कि उसे नेताओं के गांव चौटाला की सरपंच बनने का मौका मिलेगा। दरअसल उसके पति रणजीत ने हंसी-मजाक करते हुए उससे पूछ लिया कि सरपंच बनोगी? मुस्कान के साथ निर्मला ने भी सिर हिला दिया। फिर क्या था, जैसे ही पंचायती चुनाव की घोषणा हुई तो रणजीत ने अपनी मिडिल पास पत्नी का नामांकन पत्र भर दिया।
शैक्षणिक योग्यता के मुद्दे पर मामला अदालत में चला गया। दीपावली से कुछ दिन पहले रणजीत का निधन हो गया। जीवन साथी के साथ छोड़कर चले जाने से बुरी तरह से टूट चुकी निर्मला ने हार नहीं मानी। अदालत के निर्णय के बाद फिर से नामांकन दाखिल करने की प्रक्रिया शुरू हुई। अपने पति की अंतिम इच्छा पूरी करने के लिए वह उठ खड़ी हुई। चूल्हा-चौका छोड़ घर की चारदीवारी से बाहर आकर गांव के बीच पहुंची। घर-घर जाकर वोट मांगे। गांव चौटाला में पहली बार महिला सरपंच का खिताब अपने नाम किया। वह भी खंड डबवाली में सबसे बड़ी जीत के साथ।
विचित्र संयोग
निर्मला की जीत में अलग ही संयोग बना। निर्मला को 4646 वोट मिले। दूसरे नंबर की उम्मीदवार को 2525 वोट मिले। निर्मला ने 2121 वोट से जीत हासिल हुई।
ससुर नहीं बन सके सरपंच, तो बहू बनी
निर्मला देवी के ससुर रेवता राम न्यूज पेपर एजेंट हैं। वर्ष 2009-10 में हुए चुनावों में उन्होंने सरपंची के लिए चुनाव लड़ा था। वे हार गए थे। ससुर सरपंच नहीं बन सकें, लेकिन बहू ने सरपंच बनकर उन्हें गांव की चौधर करने का मौका दे दिया।
बेटियों को मानती हैं बेटा
नवनिर्वाचित सरपंच की तीन बेटियां हैं। बड़ी बेटी आरजू छह साल, मंझली अनुष्का चार साल और सबसे छोटी बेटी हर्षिता महज पांच माह की है। वह बेटियों को बेटों से कम नहीं मानती है। मिडिल पास निर्मला खुद भी पढ़ना चाहती हैं। साथ में अपनी बेटियों को पढ़ाना चाहती हैं। उसका कहना है कि पढ़ाई के बिना समाज कद्र नहीं करता।
पहले खुद घूंघट छोडूंगी, फिर दूसरों का छुड़ाऊंगी
मैं, पंजाब की रहने वाली हूं। हरियाणा में शादी होने के बाद यहां की संस्कृति अपनानी पड़ी। अब सरपंच बनकर लगता है कि अगर घूंघट पहने रखा तो किसी ने पूछना तक नहीं। गांव के हकों के लिए घूंघट छोड़ूंगी। गांव की अन्य महिलाएं भी अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हों, इसके लिए उन्हें घूंघट की प्रथा से बाहर निकालूंगी। मैं, जो एक बार ठान लेती हूं, फिर उसे पूरा करके ही दम लेती हूं।
-निर्मला देवी, सरपंच
गांव चौटाला
हरियाणा-पंजाब में चर्चा
गांव चौटाला देश को एक उपप्रधानमंत्री, दो मुख्यमंत्री, पांच सांसद और तेरह विधायक दे चुका है। ऐसी कोई विधानसभा नहीं, जिसमें इस गांव का निवासी विधायक बनकर न पहुंचा हो। ऐसे में पूरे देश की नजर गांव चौटाला पर रहती है। चुनाव चाहे कैसा भी हो, चौटाला किसी न किसी कारण उभर आता है। इस बार छोटी सरकार के चुनाव में इतिहास रचने की बारी आई तो सबकी नजरें चौटाला पर ही थीं। चौटाला-बादल की दोस्ती के चर्चे अक्सर सियासत के गलियारों में गूंजते हैं। अब गांव की सरपंच बादल के गृह क्षेत्र लंबी से है, जिसके चलते दोनों राज्यों में खूब चर्चे हैं।