डबवाली। क्षेत्र में कभी कपास प्रसंस्करण और जिनिंग फैक्टरियों की भरमार रहती थी, लेकिन आज स्थिति यह है कि इक्का-दुक्का बची फैक्टरियां भी बंद होने के कगार पर पहुंच चुकी हैं। उच्च गुणवत्ता वाले बीजों की कमी, गुलाबी सुंडी का प्रकोप और सरकारी उदासीनता ने इस उद्योग को लगभग समाप्त कर दिया है।
उद्योगपतियों ने सरकार से ठोस नीति बनाने की अपील की है, ताकि कपास और कपड़ा उद्योग को संजीवनी मिल सके। कपास उद्योग से जुड़े व्यापारी पवन शारदा ने बताया कि कुछ वर्ष पहले तक डबवाली क्षेत्र में कई कपास उद्योग सक्रिय थे, लेकिन सरकार से मदद न मिलने और नीतियां कॉटन उद्योग के अनुकूल न होने से अधिकांश उद्योग बंद हो गए। वर्तमान में सिर्फ दो फैक्टरियां ही काम कर रही हैं। उन्होंने कहा कि कपास उद्योग के गिरने की दो बड़ी वजहें हैं- नरमे की खराब फसल और सरकारी नीतियां।
सीसीआई की खरीद से प्राइवेट इंडस्ट्री पर असर
शारदा ने बताया कि कॉटन कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (सीसीआई) किसानों से मंडियों में एमएसपी पर नरमा खरीदती है। चूंकि एमएसपी प्राइवेट इंडस्ट्री की दर से ज्यादा होती है, इसलिए निजी फैक्टरियां प्रतिस्पर्धा नहीं कर पातीं। वहीं, एमएसपी निर्धारित होने के बावजूद सीसीआई गुणवत्ता के नाम पर बहुत कम खरीद करती है। इसका सीधा असर उद्योग पर पड़ता है और उन्हें महंगे दामों पर कच्चा माल खरीदना पड़ता है।
बीज की खराब गुणवत्ता बनी बड़ी चुनौती
क्षेत्र में नरमे की फसल की स्थिति भी लगातार गिर रही है। किसानों और व्यापारियों के अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में उत्पादन और गुणवत्ता दोनों में भारी गिरावट आई है। इसका सबसे बड़ा कारण घटिया बीज हैं, जिनसे कपास का रंग और खल की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है।
भावांतर योजना की मांग
व्यापारियों ने सरकार से भावांतर योजना लागू करने की मांग की है। इस योजना के तहत यदि किसानों को एमएसपी से कम मूल्य मिलता है, तो सरकार अंतर की राशि सीधे उनके खाते में डाले। इससे किसानों को नुकसान से राहत मिलेगी और वे बेहतर बीजों की ओर आकर्षित होंगे।
रोजगार पर खतरा
कपास उद्योग की गिरावट ने मजदूरों और स्थानीय युवाओं के रोजगार पर गहरा असर डाला है। बड़ी संख्या में लोग बेरोजगार हो गए हैं या फिर उन्हें कम वेतन पर काम करने को मजबूर होना पड़ रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि हालात नहीं बदले तो डबवाली समेत देश के अन्य कपास उत्पादक क्षेत्रों में गंभीर आर्थिक संकट खड़ा हो सकता है, जिसका असर राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था तक पहुंचेगा।
इन पर देना होगा सरकार को ध्यान
- सरकार उच्च गुणवत्ता वाले बीजों की व्यवस्था करनी होगी।
- सीसीआई की खरीद प्रक्रिया को पारदर्शी व लचीला बनाना होगा।
- भावांतर योजना को लागू कर किसानों को एमएसपी का लाभ सुनिश्चित करना होगा।
- प्राइवेट फैक्टरियों को प्रोत्साहन देने के लिए विशेष पैकेज व नीतियां बनानी होंगी।
बीज की खराब गुणवत्ता के कारण किसान अब कपास की खेती छोड़कर धान की तरफ रुख कर रहे हैं। धान की खेती में पानी की खपत अत्यधिक होती है, जिससे भविष्य में जल संकट भी गहरा सकता है। विदेशों में इस्तेमाल होने वाले बीज की गुणवत्ता कहीं बेहतर है, जिससे पैदावार भी अधिक और गुणवत्ता भी अच्छी होती है। ऐसे में सरकार को चाहिए कि वह अच्छे बीजों की व्यवस्था करे और किसानों तक उन्हें आसानी से पहुंचाए। इतना ही नहीं, कपास उद्योग में कार्यरत व्यापारियों को भी सरकार की ओर से सहयोग दिया जाना चाहिए। - गुरदीप कामरा, प्रवक्ता, हरियाणा प्रदेश व्यापार मंडल।