एम टैक्स या पंचायत टैक्स, ढाणियों से लेकर गांव के लोग दे रहे, किसी को नहीं जानकारी
जिला परिषद के खाते में जाता है पैसा, कोई पूछने वाला नहीं
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सिरसा। ग्राम विकास के नाम पर बड़े स्तर पर बिल के नाम पर ग्रामीणों से लूट हो रही है। साधारण बिल में म्युनिसिपल टैक्स के तौर पर ढाणियों व गांव के ग्रामीणों से लिए जाने वाला यह टैक्स सही मायने में पंचायत टैक्स है। इसकी जानकारी किसी को नहीं है।
हर साल लाखों रुपये बिजली के बिलों के माध्यम से एक गांव से बिजली निगम इकट्ठा कर जिला परिषद को देता है और इसी पैसे पर अधिकार जमाकर जिला परिषद पंचायतों को देने में भेदभाव करता नजर आता है। हैरानी की बात है कि गांवों में जहां सरकार ने सोलर लाइट दी है। ऐसे में मुख्य रूप से स्ट्रीट लाइट के लिए प्रयोग होने वाले इस पैसे का प्रयोग किस आधार पर हो रहा है।
तालाबों से लेकर सीधे तौर पर अमृत भारत के तहत पैसा आता है। सफाई कर्मचारियों को सरकार पैसा देती है। ऐसे में गांव के लोगों से बिजली में टैक्स के तौर पर यह पैसा कहां प्रयोग किया जाता है। आज तक इस संबंध में किसानों को अवगत तक नहीं करवाया गया।
सही मायने में टैक्स देने के बाद पंचायत की जिम्मेदारी बिजली सुविधा यानी स्ट्रीट लाइट सुविधा को ग्रामीण व ढाणियों के क्षेत्र में उपलब्ध करवाने की बन जाती है। मगर गांव के बीच से ढाणियों से होकर गुजरने वाली सड़कों पर कहीं भी सोलर या अन्य स्ट्रीट लाइट नजर नहीं आती है।
12 पैसे के हिसाब से प्रति यूनिट लिया जाता है यह पैसा
आंकड़ों के अनुसार, पंचायत टैक्स यानी एम टैक्स की वसूली का हिसाब बड़ा निराला है। इस बारे में किसी को कुछ पता नहीं चलता है। प्रति यूनिट करीब 12 पैसे के आसपास पैसा लिया जाता है। इस पैसे के बारे में कोई सोचता ही नहीं है। अनुमान के अनुसार, यदि एक गांव में 50,000 यूनिट एक माह में बिजली खर्च होती है तो 6000 रुपये सीधे तौर पर टैक्स के तौर पर पंचायत को जाता है। ऐसे में साल में 72 हजार रुपये एक पंचायत को जाता है। बड़े गांवों में यह आंकड़ा लाखों तक पहुंच जाता है। ऐसे में बिना कुछ कहे पंचायत का टैक्स का सिस्टम चलता रहा है। बिजली सुविधा के नाम पर यह वसूली होती है। इसके अलावा, अन्य टैक्स बिजली निगम अपने स्तर पर लेता है।
अब तक नहीं है सभी ढाणियों में सोलर व स्ट्रीट लाइट
भले ही ग्रामीण क्षेत्र में गांव व ढाणियों से टैक्स के तौर पर वसूली हो रही है। मगर बड़े स्तर पर गांवों में कोई स्ट्रीट लाइट नहीं है। जिला परिषद की बैठकों में सरपंच स्ट्रीट लाइट मांगते हैं जबकि यह पैसा उनके गांव के लोग ही जिला परिषद को देते हैं। इस पैसे पर पंचायत का सीधे तौर पर अधिकार होता है। इसका प्रयोग मुख्य रूप से स्ट्रीट लाइट के लिए ही किया जाता है मगर सरपंचों को जानकारी का अभाव होने के कारण वे अपने अधिकार से वंचित हैं। संवाद
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शहरों में जिस प्रकार से म्युनिसिपल टैक्स लिया जाता है। उसी प्रकार से गांवों में यह पंचायत टैक्स है। मशीन से निकलने वाली बिलिंग में डेटा फीडिंग में कहीं दिक्कत है। उसे दुरुस्त करवा दिया जाएगा। सही मायने में यह पंचायत टैक्स होता है जो नियमानुसार लिया जाता है।
-कुलदीप अत्री, अधीक्षण अभियंता, डीएचबीवीएन।