सिरसा। हॉकी खेल से जो सम्मान मिला है उसे मैं शब्दों में बयान नहीं कर सकती। मैंने मेहनत की ओर आज मैं भारत के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खेल रही हूं। मेेरे पिता हर समय मुझे हौसला देते थे ताकि मैं अपने खेल पर ध्यान केंद्रित कर सकूं।
यह कहना है सिरसा के जोधका गांव की अंतरराष्ट्रीय हॉकी खिलाड़ी सविता पूनियां का। उन्होंने बताया कि छठी कक्षा में उसने हॉकी स्टिक को पकड़ा था। उस समय हॉकी स्टिक उनके कंधे तक आती थी। 2004 में सविता ने सिरसा के महाराजा अग्रसेन स्कूल में कोचिंग शुरू की। खेल गतिविधियों में सविता की फुर्ती देख अध्यापक दीपचंद ने उनके पिता महेंद्र से बेटी का नाम हॉकी नर्सरी में दर्ज करवाने की बात कही थी। उस समय अभिभावक बेटियों को खेलकूद में नहीं डालते थे, लेकिन पिता ने हॉकी की कोचिंग दिलवाने के लिए सहमति जता दी। पिता से बात करते समय अध्यापक दीपचंद ने मजाक में कहा था कि अच्छा खेलेगी तो एक दिन विदेश जाएगी। जिस पर पिता ने कहा कि गांव की बेटियों को विदेश कौन लेकर जाएगा।
कोचिंग के दौरान खेल छोड़ने का भी बनाया था मन
नर्सरी हॉकी में दाखिले के बाद शुरूआती 2 साल कोचिंग के बहुत कठिन थे, इस दौरान कई बार खेल छोड़ने का मन किया, पिता ने भी कहा अगर सहीं नहीं लग रहा तो छोड़ दे। रात भर सोचने के बाद सुबह खुद ब खुद दिमाग हॉकी स्टिक को खोजने लगता। सविता पूनिया भारतीय महिला हॉकी टीम में गोलकीपर के तौर पर खेल रही है।
2018 में मिला अर्जुन अवॉर्ड
जर्मनी में 2008 में हॉकी टूर्नामेंट खेलने के बाद उसने हॉकी स्टिक को कभी भी अपने से दूर नहीं होने दिया। उसके बाद 2016 में उसने ओलंपिक खेला और अब 2021 में रियो ओलंपिक में भाग लेंगी। वर्ष 2018 में सविता अर्जुन अवॉर्ड से भी सम्मानित हो चुकी हैं। सविता के पिता महेंद्र स्वास्थ्य विभाग में कार्य करते हैं। उन्होंने बताया कि जब बेटी खेल को छोड़ने का मन बनाती थी तो वह उसकी बात पर हमेशा सहमति देते थे। लेकिन उन्हें पता होता था कि यह सुबह होते ही अभ्यास के लिए मैदान में खड़ी मिलेगी।