सिरसा। चौधरी देवीलाल विश्वविद्यालय के मानविकी संकाय की ओर से आयोजित दो दिवसीय भारतीय भाषा परिवार सम्मेलन का समापन टैगोर भवन एक्सटेंशन में हुआ। संगोष्ठी के दौरान भारतीय भाषाओं की उत्पत्ति, उनके पारिवारिक स्वरूप, भाषाई एकता, अनुवाद, बोली-विविधता और संस्कृति से जुड़े अनेक विषयों पर प्रस्तुतियां दी गईं।
समापन सत्र के मुख्य अतिथि के रूप में डॉ. बीआर आंबेडकर स्टडी सेंटर, कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के निदेशक डॉ. प्रीतम सिंह ने कहा कि भारतीय भाषाएं केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि समूचे भारत को जोड़ने वाली सांस्कृतिक कड़ी हैं। भाषाएं परिवारों को एक सूत्र में पिरोती हैं और पीढ़ियों को परंपरा से जोड़ने का काम करती हैं।
भारत में जब एक बच्चा जन्म लेता है, तो उसके मस्तिष्क में भारतीय भाषा सीखने की स्वाभाविक रूपरेखा पहले से मौजूद होती है। भारतीय भाषाओं से उसका पहला जुड़ाव सहज और जन्मजात होता है। किसी अन्य भाषा को सीखने के लिए उसे अतिरिक्त प्रयास करने पड़ते हैं, जबकि भारतीय भाषाएं उसके मानसिक गठन का स्वाभाविक हिस्सा होती हैं।
डॉ. प्रीतम सिंह ने भारतीय परिवार व्यवस्था पर प्रकाश डालते हुए कहा कि भारतीय परिवार पूरे विश्व में परिवार की एक मिसाल प्रस्तुत करते हैं। इन परिवारों की मजबूती के मूल में हमारी भाषाएं, संस्कार और सांस्कृतिक संवाद निहित हैं। अंत में प्रो. अनु शुक्ला ने अतिथियों, प्रतिभागियों और सहयोगी विभागों का धन्यवाद किया। संगोष्ठी के सफल आयोजन के लिए सभी सहभागी विभागों की भूमिका की सराहना की गई।
समापन सत्र में कुलपति प्रो. विजय कुमार, कुलसचिव डॉ. सुनील कुमार, मानविकी संकाय के डीन प्रो. पंकज शर्मा, संयोजक प्रोफेसर अनु शुक्ला, सहसंयोजक प्रो. उमेद सिंह, विभिन्न विभागों के प्राध्यापकों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों ने बड़ी संख्या में भाग लिया।