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Sirsa News: धुआं नहीं, दुआएं कमाई... पराली प्रबंधन से बदली किसान की तकदीर

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सिरसा। खेत में पराली की गांठे बनाते हुए मशीन। संवाद
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सिरसा। पर्यावरण संरक्षण और फसलों के मित्र कीटों को बचाने की सोच के साथ आगे बढ़े गांव पोहड़का के निर्मल धालीवाल आज पराली प्रबंधन के क्षेत्र में मिसाल बन चुके हैं। वर्ष 2018 में शुरू हुए उनके इस प्रयास से आज करीब 40 लोगों को रोजगार मिला है और आठ हजार एकड़ भूमि से पराली का समुचित प्रबंधन किया जा रहा है।
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पराली से तैयार तूड़ी गुजरात व राजस्थान की गोशालाओं में पशुचारे के रूप में भेजी जाती है। 42 वर्षीय निर्मल धालीवाल ने वर्ष 2018 में पराली से गांठें बनाने की शुरुआत की थी। धीरे-धीरे इस कार्य को बढ़ाते हुए उन्होंने तीन बड़े राउंड बेलर मशीनें खरीदीं, जो एक दिन में 250 एकड़ भूमि से पराली उठाकर उसकी गांठें बना सकती हैं। बाद में इन गांठों को प्रोसेस कर छोटी गांठें और तूड़ी तैयार की जाती है।

निर्मल बताते हैं कि अगर पराली का सही उपयोग किया जाए तो इससे न केवल फसलों के मित्र कीटों की रक्षा होती है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और पशुचारे की किल्लत दूर करने में भी मदद मिलती है।
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प्रदूषण रोकने की सोच से शुरू हुआ सफर
निर्मल धालीवाल ने बताया कि कुछ वर्ष पहले खेतों में अवशेष जलाने से मित्र कीटों के नष्ट होने का एहसास हुआ। तभी उन्होंने ठान लिया कि पराली को जलाने के बजाय इसका प्रबंधन किया जाएगा। वर्ष 2018 में एक बेलर मशीन से शुरूआत की, जो एक दिन में मात्र 20 एकड़ से पराली उठा पाती थी। सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और धीरे-धीरे इस काम को विस्तार देते हुए बड़ी मशीनें जोड़ीं। आज उनके पास आधुनिक उपकरण हैं, जो एक दिन में 250 एकड़ क्षेत्र से पराली उठाने की क्षमता रखते हैं। उन्होंने बताया कि वे खुद भी अपनी 20 एकड़ भूमि पर धान की खेती करते हैं और पराली प्रबंधन के लिए तकनीक का इस्तेमाल करते हैं।

हर साल बढ़ती मांग, लाखों क्विंटल पराली का प्रबंधन
निर्मल धालीवाल ने बताया कि एक एकड़ से औसतन 25 क्विंटल पराली निकलती है। वर्तमान में वे हर साल करीब दो लाख क्विंटल पराली का प्रबंधन कर रहे हैं। इस पराली का एक हिस्सा गांठों के रूप में और बाकी का हिस्सा तूड़ी बनाकर गोशालाओं को दिया जाता है। उन्होंने बताया कि राजस्थान के सांचौर क्षेत्र की पथमेड़ा गोशाला में ही करीब एक लाख क्विंटल तूड़ी की मांग रहती है। इसके अलावा गुजरात की कई गोशालाएं भी उनसे तूड़ी मंगवाती हैं। निर्मल ने कहा कि पराली की मांग पावर प्लांटों से भी आती है, लेकिन वे इसे वहां नहीं बेचते क्योंकि उनका उद्देश्य पर्यावरण बचाने के साथ-साथ पशुचारे की उपलब्धता बढ़ाना है। धालीवाल के प्रयासों को देखते हुए जिला प्रशासन और कृषि विभाग भी कई बार उन्हें सम्मानित कर चुका है।

सिरसा। खेत में पराली की गांठे बनाते हुए मशीन। संवाद

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