सिरसा। पराली प्रबंधन को अपना व्यवसाय बनाकर पोहडका के निर्मल सिंह लाखों रुपये कमा रहे हैं। वे चार सालों में पराली प्रबंधन कर रहे हैं। इसके साथ ही दो से तीन गांवों के खेतों से पराली की गांठ बनाकर राजस्थान की गोशालाओं को बेचते हैं। इससे गायों को जहां चारा मिलता है, वहीं निर्मल सिंह की कमाई भी हो जाती है।
गांव पोहड़का के निर्मल सिंह ने बताया कि धान के सीजन के अंत में पराली प्रदूषण बहुत ज्यादा होता था। सुबह और शाम सीजन के समय धुंआ ही धुंआ नजर आता था। ऐसे में पराली प्रबंधन को लेकर उसे सरकार की योजना का पता चला। 2018 में कृषि विभाग से उसने बेलर खरीदा। उस समय ऐलनाबाद जिले में बेलर खरीदने वाला वह पहला किसान था। शुरूआत में पराली इकट्ठा करने के लिए 16 से 17 गांवों में जाना पड़ता था। आलम यह था कि जब पराली से गांठ बना रहे होते थे तो दूसरे खेतों में किसान आग लगा देते थे। । उन्होंने कहा कि शुरुआती एक या दो साल कोई खास मुनाफा नहीं हुआ। वर्ष 2020 के आस पास सरकार ने पराली प्रबंधन को लेकर सख्ती दिखानी शुरू कर दी। इसका लाभ भी मिला।
उन्होंने बताया कि अब गांवों के लोग पराली जलाने से गुरेज करने लगे हैं। किसान को पता चल गया है कि आगजनी के भूमि को क्या नुकसान होता है। अब दो से तीन गांवों में घूमकर ही पराली का स्टाक पूरा हो जाता है। उन्होंने बताया कि हर सीजन दो तीन गांवों से तीन हजार एकड़ की पराली की गांठ बनाकर स्टाक करते हैं।
बीकानेर तक जाती है पराली
निर्मल सिंह ने बताया कि पराली अब घाटे का सौदा नहीं रहा है। सीजन में आठ से 10 लाख की कमाई हो जाती है। पराली का सारा स्टाक राजस्थान में गोशालाओं के पास जाता है। वहां पर इसका चारा बनाया जाता है। उन्होंने बताया कि राजस्थान में रावतसर से भादरिया और उसके बाद फलौदी व बीकानेर तक पराली जाती है।
किसानों को मिलती है सरकार से प्रोत्साहन राशि
निर्मल सिंह ने बताया कि किसानों के खेत को खाली करने का काम वह करते हैं। इस दौरान खेत में पराली रीपर से कटवाने का काम किसान करता है। उसका यह खर्च उसे सरकार से मिलने वाली प्रोत्साहन राशि से निकल जाता है। हम गांठ बनाकर उसको बेचकर अपना खर्च व मुनाफा कमा लेते हैं।