शहीद कृष्ण कुमार भारतीय सेना में 17वीं जाट रेजीमेंट में बहादुर सिपाही था। कारगिल लड़ाई के दौरान सिपाही कृष्ण कुमार टाइगर हिल्स पर दुश्मनों से लोहा लिया। इस दौरान उन्होंने बहादुरी से दुश्मनों का सामना करते हुए आठ पाक सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया। 30 मई 1999 को वे दुश्मन से लोहा लेते हुए शहीद हो गए थे। भीषण गोलीबारी और सर्दी के कारण कृृष्ण कुमार का पार्थिव शरीर सेना को उस समय नहीं मिला।
45 दिन बाद सेना को बर्फ में शहीद कृष्ण कुमार का पार्थिव शरीर मिल गया। भारतीय सेना के जवान 16 जुलाई को शहीद का पार्थिव शरीर गांव तरकांवाली लेकर पहुंचे और पूरे सैन्य सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार किया। शहीद कृष्ण कुमार की सेना में पहली नियुक्ति श्रीनगर में हुई थी। 23 साल बाद भी ग्रामीणों को शहीद कृष्ण कुमार की शहादत ज्यों की त्यों याद है।
परिजनों ने अपने खर्च पर स्थापित की शहीद की प्रतिमा
शहीद की वीरांगना संतोष का कहना है कि उसे इस बात का मलाल रहता है कि शहादत के दिन को सरकार व प्रशासन हर बार भूल जाता है। उन्हें अपने पति की शहादत पर गर्व है। गांव में बने स्मारक पर शहीद की प्रतिमा को परिजनों ने अपने खर्चे पर स्थापित किया है। शहीद के आश्रितों को आर्थिक सहायता दी जा चुकी है। शहीद के भाई को सरकारी नौकरी के अलावा परिजनों को गैस एजेंसी भी दे रखी है। गांव के स्कूल का नामकरण तो शहीद के नाम से हो गया है। हालांकि गांव के पास गुजरने वाली सड़क का नामकरण शहीद के नाम होना बाकी है।
शहीद कृष्ण कुमार में देश सेवा की भावना बचपन से ही थी। कृष्ण एक अच्छा खिलाड़ी होने के साथ साथ पढ़ाई में होशियार थे। गांव शाहपुरिया के स्कूल में जाते समय कृष्ण हमेशा ही देशभक्ति से ओत प्रोत बातें करते थे। सरकार ने कृष्ण की शहादत के समय गांव के स्कूल का नामकरण शहीद के नाम व दर्जा बढ़ाने की घोषणा की थी, लेकिन अब तक स्कूल को मिडिल से हाई स्कूल का दर्जा भी नहीं दिया है। सरकार को स्कूल का दर्जा बढ़ाकर शहीद का सम्मान बढ़ाना चाहिए।
-लीलू राम बैनीवाल, गांव तरकांवाली
कृष्ण कुमार सदा से ही हंसमुख व सादगी पसंद थे। खेलों में, समाज सेवा में हर समय आगे रहते थे। हम वॉलीबाल प्रतियोगिताओं में कई बार साथ खेलते थे। कारगिल युद्ध का नाम सुनते ही उस समय की बातें याद आने लगती हैं। कृष्ण कुमार गांव में बने युवा क्लब के सदस्य थे। वह हमेशा हर सामाजिक कार्यों में भाग लेकर सेवा करते थे। इसके साथ ही फौज में भर्ती होने की बातें भी करते थे।
- राय सिंह, गांव तरकांवाली
कारगिल युद्ध में शहीद सिपाही कृष्ण कुमार की शहादत पर हमें नाज है। लेकिन इस बात का मलाल रहता है कि कृष्ण की शहादत के दिन 30 मई को गांव में स्मारक स्थल पर श्रद्धांजलि कार्यक्रम में सरकार व प्रशासन की तरफ से कोई नहीं पहुंचता। सरकार घोषणाएं तो करती है, फिर भूल जाती है या आधी अधूरी ही पूरी हो पाती है। सामान्य लोगों के लिए की गई घोषणाओं कि तो अनदेखी की जा सकती है, लेकिन यदि मामला देश पर प्राण न्यौछावर करने वाले जांबाज सिपाही का हो तो लोगों के मन में पीड़ा होना स्वाभाविक है।
- संदीप बांदर तरकांवाली
शहीद कृष्ण कुमार की शहादत पर गांव तरकांवाली के लोगों को ही नहीं परंतु पूरे पैंतालिसा क्षेत्र के लोगों को नाज है। कारगिल युद्ध के शहीदों को पूरा देश कभी नहीं भूल सकता। क्षेत्र के युवा कृष्ण कुमार की देश भक्ति से प्रेरणा लेकर फौज में भर्ती होकर देश सेवा कर रहे हैं। सरकार को सभी घोषणाएं पूरी करनी चाहिए, जो शहादत के समय की गई थी।
-पवन गहलोत, गांव नाथूसरी कलां।