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कॉटन का उत्पादन बढ़ा, मुनाफा नहीं

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 अमेरिकन कॉटन के बीजों में सुधार होेने के बाद कपास का उत्पादन तो बढ़ रहा है, लेकिन किसानों का मुनाफा कम होता जा रहा है। फसल पर आने वाला खर्च हर वर्ष बढ़ जाता है, लेकिन कॉटन का न्यूनतम समर्थन मूल्य कम होने के कारण किसानों के हाथ खाली जैसे ही रहते हैं।
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 हालांकि बीटी कॉटन के बीज आने के बाद किसानों का मोह एक बार फिर कॉटन की तरफ बढ़ा है। इसके बावजूद उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार नहीं हो पा रहा है। इस पर विचार करने के लिए विभिन्न संस्थानों के अर्थशास्त्रियों को हरियाणा में कॉटन की फसल पर लागत और आमदन पर स्टडी करने के लिए टीम के रूप में जोड़ा गया है।

प्रदेश में 20 वर्षों से सबसे ज्यादा कॉटन उत्पादन कर रहे सिरसा जिले के किसानों की आर्थिक दशा अब तक न सुधरना इस बात का प्रमाण है कि कॉटन की खेती में आमद वर्ष दर वर्ष कम होती जा रही है। जो जिला उत्पादन में सबसे आगे हो और उस जिले के किसानों को कर्ज से मुक्ति न मिले यह गंभीर विषय है।
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 किसानों की माने तो स्थिति स्पष्ट है कि कॉटन की खेती पर होने वाली लागत में 20 से 30 प्रतिशत हर वर्ष बढ़ोतरी हो जाती है और कॉटन के न्यूनतम समर्थन मूल्य में मात्र एक या सवा प्रतिशत बढ़ोतरी ही हो पाती है। इसके अलावा फसल के खराब होने पर किसानों को 10 से 15 हजार रुपये प्रति एकड़ के हिसाब से घाटा भी लगता है। हालांकि वर्ष 2000 के बाद जिले में कॉटन का रकबा कम होता जा रहा है, लेकिन उत्पादन बढ़ा है।

 वर्ष 1975 में जिले का औसतन उत्पादन साढ़े तीन क्विंटल प्रति एकड़ था जो अब बढ़कर साढे़ सात क्विंटल को भी पार कर गया है। खेती करने के लिए प्रयुक्त वस्तुओं के दाम तो कंपनियां तय करती हैं, लेकिन कॉटन का रेट किसान स्वयं तय नहीं कर सकता।

हरियाणा में अमेरिकन कॉटन की लागत और आमदन पर कृषि विश्वविद्यालय ने पहल करते हुए एक कदम उठाया है। प्रदेश स्तर पर एक कमेटी का गठन किया गया है जो तीस वर्षों से कॉटन की खेती पर आने वाले खर्च, उत्पादन रेट पर स्टडी कर वास्तविक रिपोर्ट तैयार करेगी।

 इस टीम की रिपोर्ट को सरकार के पास भेजा जाएगा ताकि प्रदेश के किसानों का कॉटन की खेती से मोह भंग न हो। इस टीम में सीडीएलयू के अर्थशास्त्र विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. अभय गोदारा, इसी संस्थान की डॉ. ऊषा पुनिया, हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय के कृषि अर्थशास्त्र विभाग के सहायक वैज्ञानिक डॉ. दलीप कुमार बिश्नोई व राजस्थान के एसके कॉलेज ऑफ एग्रीकल्चर संगरिया के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. शिवा प्रकाश को शामिल किया गया है।

दाम बढ़े तो ही बात बने : भारूखेड़ा
हरियाणा किसान मंच के प्रधान प्रहलाद सिंह भारूखेड़ा ने बताया कि कॉटन की फसल पर लगभग 20 हजार रुपये प्रति एकड़ खर्च आता है, जबकि इसके दाम 3350 रुपये प्रति क्विंटल निर्धारित किए गए हैं। प्रति एकड़ में लगभग आठ क्विंटल कॉटन होती है। ऐसे में किसान को बहुत कम मुनाफा होता है। यदि फसल में बीमारी आ जाए तो किसानों को बड़ा नुकसान हो जाता है। इसके दाम बढ़ाए जाने चाहिए।
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कॉटन उत्पादन की स्थिति जिले में इस प्रकार है
वर्ष       क्षेत्र एकड़ में       उत्पादन क्विंटल में  
1975      74000             125000
1980      101000            204000
1985      112000            245000
1990      163000            400000
1995      216000            554000
2000      200000            531000
2005      193000            581000
2010      189000            706000
2012      199000            899000


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