- ससुराल पक्ष में सिर्फ महिला को समायोजन करना, खान-पान में बदलाव, बच्चों की अधिक चिंता करना अवसाद का मुख्य कारण
सिरसा। इन दिनों एक नई सामाजिक समस्या सामने आ रही है। बड़ी संख्या में महिलाएं अपने पतियों द्वारा समय न दिए जाने के कारण तनाव, चिंता और अवसाद की शिकार हो रही हैं। मनोवैज्ञानिकों के पास पहुंचने वाले मामलों में अब महिलाओं की संख्या लगातार बढ़ रही है। इनमें अधिकतर शिकायतें पारिवारिक उपेक्षा और भावनात्मक दूरी से जुड़ी होती हैं।
मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, हर महीने आने वाले कुल मामलों में लगभग 55 फीसदी मामले महिलाओं से संबंधित होते हैं। यदि एक माह में करीब 200 मामले आते हैं तो उनमें से 110 से 120 मामले महिलाओं के होते हैं। वहीं, छह महीने में लगभग 700 मामले ऐसे आते हैं जिनमें महिलाएं अवसाद की शिकार हो रही हैं।
विशेषज्ञ ने बताया कि इन मामलों में सबसे बड़ी वजह पति-पत्नी के बीच समय की कमी और संवाद का अभाव है। कई महिलाएं यह शिकायत लेकर आती हैं कि उनके पति घर पर कम समय बिताते हैं या घर आने के बाद भी परिवार के साथ गुणवत्ता वाला समय नहीं देते। इससे महिलाओं में अकेलेपन की भावना बढ़ती है जो धीरे-धीरे मानसिक तनाव और फिर अवसाद का रूप ले लेती हैं। संवाद
महिलाओं में बच्चों को लेकर चिंता, अवसाद का बड़ा कारण
महिलाओं में बच्चों को लेकर चिंता भी एक बड़ा कारण बन रही है। मां होने के नाते महिलाएं बच्चों की पढ़ाई, स्वास्थ्य और भविष्य को लेकर अधिक चिंतित रहती हैं। यही चिंता कई बार मानसिक दबाव में बदल जाती है। बच्चों से जुड़े मामलों में शिकायत लेकर आने वाली माताओं की संख्या अधिक होती है जबकि पिता कम ही इन मुद्दों पर परामर्श लेने आते हैं।
पत्नी को प्राथमिकता न देना भी महिलाओं में बढ़ा रहा अवसाद
काउंसिलिंग के दौरान कई महिलाओं ने यह भी बताया कि उनके पति परिवार में उन्हें प्राथमिकता नहीं देते। वे अपने माता-पिता, भाई-बहनों को ज्यादा महत्व देते हैं जिससे महिलाओं को उपेक्षा महसूस होती है। इस भावनात्मक दूरी के कारण रिश्तों में खटास बढ़ती है और महिलाएं मानसिक रूप से कमजोर पड़ने लगती हैं। मनोवैज्ञानिक डॉ. रविंद्र पुरी का कहना है कि अकेलापन महिलाओं के लिए सबसे बड़ी चिंता का कारण बनता जा रहा है। जब उन्हें अपने जीवनसाथी का साथ और समझ नहीं मिलती तो वे अंदर ही अंदर घुटने लगती हैं। ऐसे में समय रहते समाधान न मिलने पर यह स्थिति गंभीर मानसिक समस्याओं का रूप ले सकती है।
इस प्रकार आ रहे मामले
मामला - 1
काउंसिलिंग के दौरान अन्य शहर से आई एक महिला ने बताया कि शादी के बाद वह अपनी ससुराल गई। इस दौरान ससुराल पक्ष की खाने-पीने व रहने की आदतें बिल्कुल ही अलग थीं। पहले हर समय महिला एसी में रहती थी सुसराल में एसी का टाइम फिक्स था कि इस वक्त ही एसी चलेगा। वहीं, महिला को हेल्दी खाना-पीना पसंद था। वहीं, ससुराल पक्ष को तेल, घी व तला हुआ खाना खाते थे। जहां लड़की को लेट उठना पसंद था तो सुसराल वाले 4-5 बजे उठा देते थे। हर बात पर महिला को ही समायोजन के लिए कहा जाता था। परिवार की तरफ से किसी प्रकार का भी समायोजन नहीं किया गया। ऐसे में महिला उदासी फिर धीरे-धीरे अवसाद की शिकार हो गई।
मामला - 2
एक अन्य मामले में काउंसिलिंग में मनोवैज्ञानिक ने बताया कि एक महिला की एक बच्ची होती है। जब वह बड़ी होती है तो चलना और भागना शुरू करती है। ऐसे में सारा काम महिला पर पड़ा जाता है। वह पूरे घर को भी संभालती है। बच्ची को स्कूल लेकर जाना, छोड़कर आना, उसे होमवर्क करवाना, टयूशन, खेलना, खिलाना, सुलाना, संस्कार देना सब मां की जिम्मेदारी बन जाती है। महिला को अपना कॅरिअर, अपने शौक सब छोड़ने पड़ जाते हैं। ऐसे में महिला को चिंता हो गई कि मुझे कुछ हो गया तो मेरी बेटी का क्या होगा। इस चिंता से महिला अवसाद की शिकार हो गई।
मामला - 3
एक अन्य मामले में मनोवैज्ञानिक ने बताया कि उनके पास एक महिला आती है। काउंसिलिंग के दौरान पता चलता है कि महिला का एक छोटा बच्चा है। उसे कोई शारीरिक बीमारी है। बच्चे का पूरा ध्यान रखने का जिम्मा महिला का है। पति का सहयोग सिर्फ पैसे देने तक का है। पति न ही बच्चे को समय दे पा रहा है और न ही महिला को। ऐसे में महिला चिंता करना शुरू कर देती है और उदासी का शिकार हो जाती है।
एक्सपर्ट की सलाह
- पति-पत्नी के रिश्ते में समय और संवाद बेहद जरूरी है।
- पतियों को चाहिए कि वे समय पर घर आएं और अपनी पत्नी के साथ कुछ समय बिताएं, उनकी भावनाओं को समझें और उनका सहयोग करें।
- छोटी-छोटी बातचीत और साथ बिताया गया समय रिश्तों को मजबूत बना सकता है और मानसिक तनाव को कम करने में मददगार साबित हो सकता है।
- यदि इस समस्या को समय रहते गंभीरता से नहीं लिया गया तो आने वाले समय में यह एक बड़ी सामाजिक चुनौती बन सकती है।
- इसलिए परिवार के सभी सदस्यों को मिलकर रिश्तों में संतुलन और समझ बनाए रखने की आवश्यकता है ताकि महिलाओं का मानसिक स्वास्थ्य बेहतर बना रहे।
- सिर्फ महिला से ही समायोजन की उम्मीद न रखें, पति व परिवारवाले भी महिलाओं के साथ समायोजन करें।
वर्जन
मेरे पास हर दिन महिलाओं के मामले आते हैं। इसमें महिलाएं पति की शिकायतें लेकर पहुंच रही है। इसे गृहकलह का नाम नहीं दे सकते। भाग-दौड़ की जिंदगी में पति महिलाओं को समय देना भूलते जा रहे हैं। इस कारण महिलाएं उदासी, चिंता और अवसाद की शिकार हो रही हैं। मेरे पास हर महीने 200 में से 110-120 मामले महिलाओं से संबंधित आ रहे हैं।
- डॉ. रविंद्र पुरी, मनोवैज्ञानिक, सिरसा।