फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

मौसम बदलते ही सिरसा में ठौर-ठिकाना ढूंढने लगे विदेशी पक्षी

Mon, 07 Dec 2015 12:24 AM IST
अमर उजाला सिरसा/ब्यूरो
विज्ञापन
विज्ञापन
सर्दी के मौसम में विभिन्न देशों के पक्षी अपना ठौर-ठिकाना बनाते हैं। इस बार भी विदेशी पक्षियों के आने का सिलसिला शुरू हो गया है। ये पक्षी फरवरी मध्य तक यहां पर रहेंगे।
विज्ञापन


उसके बाद अपने देश लौट जाएंगे। विदेशी पक्षियों के आगमन पर वन्य प्राणी प्रेक्षण विभाग भी सतर्क हो गया है। हर खंड में इन पक्षियों की सुरक्षा को लेकर विभाग के गार्ड मॉनिटरिंग करेंगे।

विदेशी पक्षियों के आने की संख्या हर वर्ष कम होती जा रही है। वजह घग्घर नदी के पानी का जहीरला होना है। ओटू झील, चौपटा के सेमग्रस्त व घग्घर नदी के आसपास क्षेत्र में विदेशी पक्षी पहुंच चुके हैं।
विज्ञापन


विभाग के गार्डों ने इन पक्षियों की मॉनिटरिंग शुरू कर दी है। विभाग ने मेहमान पक्षियों की पहचान करनी शुरू कर दी है।

वन्य प्राणी निरीक्षक कृष्ण कुमार ने बताया कि जब तक ये मेहमान पक्षी यहां रहेेंगे तब तक गार्ड इनकी मॉनिटरिंग करते रहेंगे।

यदि कोई पक्षी मर जाता है तो उसका पोस्टमार्टम करवाया जाएगा ताकि इस बात का पता लगाया जा सके कि जिस देश से वे आए हैं वहां किसी बीमारी का आगमन तो हमारे यहां नहीं हो गया है।

माइग्रेटड पक्षियों का यहां पर फरवरी माह तक प्रवास रहेगा। विभाग के अधिकारियों ने लोगों से भी आह्वान किया है कि विदेशी पक्षियों का स्वागत करें और यदि कोई व्यक्ति इन्हें मारता देखा जाए तो विभाग को तुरंत सूचित करें।

20 दिसंबर तक विदेशी पक्षियों का जिले में जमवाड़ा लग जाएगा। खासकर घग्घर नदी और ओटू झील इन पक्षियों के लिए आश्रय बनते हैं।

इन विदेशी पक्षियों का हुआ है आगमन
चीन, अफगानिस्तान, साईबेरिया, पाकिस्तान के अलावा हिमाचल व कश्मीर से ग्रेटर कार्मोरेंट, साईबेरिया से व्हाइट आइबिल, पेंटिड स्ट्रॉक, ग्रे हिरण, स्कूनबिल, नॉर्दन सोलर, मलाइड, फलेमिंगो, पेंटल आदि पक्षी आ रहे हैं।

इन प्रजातियों के अलावा भी कई प्रकार की प्रजातियों के पक्षी आते हैं। अब गार्ड सभी पक्षियों की प्रजातियों की पहचान कर रहे हैं। कुछ और प्रजातियों के होने की संभावना है। तीन सालों से साईबेरिया से रेलीकन पक्षी नहीं आ रहे हैं।

कागजों तक सिमटी वन्य सेंक्चुरी
जीव जंतुओं के लिए बनाई गई वन्य सेंक्चुरी महज खानापूर्ति तक सिमट गई। गौर करने वाली बात है कि नीलगाय, जंगली बिल्ली, बंदर आदि जीव-जंतुओं के संरक्षण के मकसद से ही डबवाली तहसील के अंतर्गत आने वाले कुछेक गांवों में वर्ष 1987 में सेंक्चुरी राज्य सरकार द्वारा बनाई गई थी।

इसमें चौटाला, तेजाखेड़ा, आसाखेड़ा, जंडवाला बिश्रोइया, गंगा, गिदडख़ेड़ा, अबूबशहर, लखुआना व सकत्ताखेड़ा 11 गांवों को शामिल किया गया है। कागजी तौर पर सेंचुरी बनाकर इसे 28,482 एकड़ का रकबा निर्धारित कर दिया गया। व्याहारिक पटल पर आज स्थिति कुछ और है।
विज्ञापन

और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें