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रायपुर के किसान सतपाल व सुरेंद्र दो भाइयों ने ककड़ी के साथ उसके बीज बेचकर बढ़ाई अपनी आमदनी

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चोपटा। गांव रायपुर के 2 किसान भाइयों सुरेंद्र व सतपाल बैनीवाल ने अपने खेत में 4 साल पहले 2 एकड़ खेत में नरमे की फसल के साथ ककड़ी लगाकर कमाई का जरिया खोजकर आत्मनिर्भर बन गए। इन्होंने नरमे की फसल के साथ-साथ उसी समय ककड़ी की भी बिजाई कर दी। विपरीत परिस्थितियों में कुछ करने के जज्बे ने किसानों को आसपास के गांवों में अलग पहचान भी दिलवाई। जिससे वे किसानों के लिए प्रेरणा स्रोत बन गए। किसान अब हर वर्ष यही प्रक्रिया अपनाकर अपनी आमदनी बढ़ा रहे हैं।
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ककड़ी के साथ-साथ उसका बीज बेचकर ऐसे होती है कमाई
गांव रायपुर के किसान सतपाल बैनीवाल ने बताया कि परंपरागत कृषि के साथ-साथ कोई अन्य काम धंधा शुरू करने का मन बनाया। ऐसे में उन्होंने परंपरागत खेती के साथ अतिरिक्त कमाई का जरिया खोजना शुरू किया। उन्होंने बताया कि परंपरागत खेती में खर्चा ज्यादा व बचत कम होने पर घाटा ही लगता। अपने भाई सुरेंद्र बैनीवाल के साथ मिलकर उन्होंने 4 साल पहले 2 एकड़ जमीन में नरमे की फसल में ककड़ी के बीज का छिड़काव कर दिया। जिससे ककड़ी की पैदावार भी शुरू हो गई। पहले साल उन्होंने ककड़ी बेची व उसका बीज निकालकर तैयार करना शुरू किया। इससे उन्हें करीब 40 हजार की अतिरिक्त आमदनी हुई। वहीं नरमे की फसल की पैदावार भी बेहतर हुई। इसके बाद उन्होंने हर वर्ष जब भी नरमे की फसल की बिजाई करते हैं, उसी समय ककड़ी के बीज भी लगा देते हैं। जिससे जब तक नरमे की फसल पकने के कगार पर आती है। तब तक ककड़ी की पैदावार भरपूर हो जाती है। ककड़ी के बीज बनाकर उन्नत किस्म के बीज बाजार में करीब 600 से 700 रुपये प्रति किलोग्राम के हिसाब से बिकते हैं। हर साल करीब 50 किलोग्राम बीज से 35 हजार रुपये की कमाई हो जाती है और ककड़ी अलग से बेचकर करीब 50 हजार रुपये की कमाई 2 एकड़ में हो जाती है। नरमे की फसल भी अपने सीजन के अनुसार अच्छी होती है। उन्होंने बताया की एक साथ दो फसलों से डेढ़ लाख रुपये प्रति एकड़ कमाई होने लगी। जिससे उनकी घर की आर्थिक स्थिति मजबूत हो गई। ककड़ी की बेल से जमीन में खाद भी अच्छी लगती है और नरमे की फसल का उत्पादन भी बेहतर होता है ।
आसपास के गांवों के लोग भी पहुंचते है बीच खरीदने
सतपाल ने बताया कि उनकी लगाई ककड़ी व उसके बीज आसपास के गांवों के लोग व सब्जी विक्रेता लेकर जाते हैं। सिरसा मंडी में सब्जी को ले जाकर बेचने में यातायात खर्च ज्यादा आता है तथा बचत कम होती है। उसका कहना है कि अगर सब्जियों व फलों की मंडी नाथूसरी चोपटा मे विकसित हो जाए तो यातायात खर्च कम होने से बचत ज्यादा हो जाएगी। इसके अलावा सरकार को अनुदान भी देना चाहिए।
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