सिरसा। छठ महापर्व पर शहरभर में भक्ति और आस्था का माहौल छा गया है। घोड़ा चौक स्थित अस्थायी बाजार में रविवार को दिनभर खरीदारी के लिए भीड़ उमड़ती रही। पूजा सामग्री, सूप, डाला, नारियल, फल-सब्जियों, गन्ना, टीका सामग्री व मिट्टी के दीपकों की दुकानों पर महिलाओं की लंबी कतारें देखने को मिलीं। शाम ढलते-ढलते बाजारों की रौनक और अधिक बढ़ गई और देर रात तक खरीदारी का सिलसिला जारी रहा।
शहर के दिल्ली पुल स्थित नहर तट पर भी छठी माता के भक्तों ने अपने-अपने घाट बनाना शुरू कर दिया है। लकड़ी, बांस, कपड़े व रोशनी की सजावट से घाटों को आकर्षक रूप दिया जा रहा है, ताकि छठ पूजा की मुख्य संध्या अर्घ्य और अगले दिन उगते सूर्य अर्घ्य को श्रद्धापूर्वक संपन्न किया जा सके। स्थानीय स्वयंसेवी संगठनों ने भी घाटों पर सफाई, प्रकाश व्यवस्था और सुरक्षा के लिए सहयोग देने की घोषणा की है।
रविवार को महिलाओं ने किया खरना
छठ महापर्व का दूसरा दिन खरना कहलाता है, जिसे बेहद पवित्र और अनुशासित परंपरा के रूप में माना जाता है। खरना के दिन छठव्रती पूरे दिन निर्जला व्रत रखते हैं। शाम के समय सूर्य देव को अर्घ्य देने के बाद वे गुड़ की खीर, रोटी और केले का प्रसाद बनाती हैं। इस प्रसाद को सबसे पहले छठी मैया और सूर्य देव को समर्पित किया जाता है। इसके बाद व्रती महिलाएं एक ही बार यह प्रसाद ग्रहण करती हैं और बाकी प्रसाद परिवार व आस-पड़ोस को वितरित किया जाता है। खरना का वास्तविक उद्देश्य शुद्धता, आत्मसंयम, और शरीर-मन की शुद्धि से जुड़ा है। इस दिन के बाद व्रती महिलाएं अगले 36 घंटे निर्जला व्रत रखती हैं, जो छठ पर्व की सबसे कठिन और अनुशासित आध्यात्मिक साधना मानी जाती है।
छठ पूजा की मुख्य संध्या आज
खरना के अगले दिन छठ की महाअर्घ्य संध्या का समय होता है। इस दौरान सभी व्रती महिलाएं नए वस्त्र धारण कर घाटों पर पहुंचती हैं। परिजनों के साथ वे डाला और सूप में केले, श्रीफल, ठेकुआ, कसार, अदरक, शकरकंद और पांच प्रकार के फल सजाकर ले जाती हैं। सूर्यास्त के समय डूबते सूर्य को सूप पर दीप रखकर अर्घ्य दिया जाता है। घाटों पर धार्मिक गीत, लोक भजन और छठी मैया की आराधना से वातावरण आध्यात्मिकता से भर जाता है।
उगते सूर्य को अर्घ्य, छठ पर्व की पूर्णाहुति कल
छठ महापर्व का अंतिम और सबसे पवित्र क्षण अगले दिन 28 अक्तूबर प्रातः काल को है। व्रती महिलाएं परिवार सहित घाट पर पहुंचकर उगते सूर्य को अर्घ्य देती हैं। माना जाता है कि डूबते सूर्य को अर्घ्य जीवन की कठिनाइयों को स्वीकार करने का प्रतीक है, जबकि उगते सूर्य का अर्घ्य नई ऊर्जा, सुख-समृद्धि और शुभ आरंभ का संदेश देता है। अर्घ्य के बाद छठव्र