हादसे के दो ऐसे मामले सामने आए, जिसने इंसानियत को शर्मसार किया। सड़क पर हादसे में घायल दो लोग तड़प-तड़पकर मदद के अभाव में इस दुनिया से चले गए। लेकिन किसी ने ऐसा करने की जहमत नहीं उठाई। अगर समय पर मदद मिलने से मेडिकल सुविधा मिल जाती तो शायद माता-पिता अपना इकलौता बेटा न खोते। जिस बेटी की डोली उठने में महज छह दिन बाकी थे, वह अपना पिता न खोती।
लापरवाही ने मां-बाप से छीन लिया इकलौता बेटा
वीरवार की रात नेशनल हाइवे नंबर नौ पर एक थ्री व्हीलर डबवाली की ओर आ रहा था। जिसे सिरसा निवासी राजकुमार चला रहा था। उसके साथ डबवाली निवासी दिव्यांग दीपक तथा सिरसा निवासी इंद्रजीत बैठे हुए थे। गांव डबवाली तथा सांवतखेड़ा के बीच अनियंत्रित थ्री व्हीलर मिट्टी के ढेर पर पलट गया। सड़क पर गिरकर दीपक बुरी तरह से घायल हो गया।
राजकुमार तथा इंद्रजीत उसे अस्पताल पहुंचाने के लिए वाहन चालकों की मिन्नतें करते रहे। कोई भी राहगीर वहां नहीं रुका। करीब आधे घंटे बाद पूर्व सरपंच रणजीत सिंह ने एंबुलेंस के जरिए तीनों को डबवाली के सरकारी अस्पताल में पहुंचाया। प्राथमिक उपचार के बाद दीपक को सिरसा रेफर किया गया। डबवाली के गोल चौक के नजदीक ही उसने दम तोड़ दिया। मृतक के रिश्तेदार मुकेश बिड़ला ने बताया कि रामचंद्र करीब तीन माह पूर्व ही नगर परिषद से सेवानिवृत्त हुए हैं। सेवानिवृत्ति के बाद पिता को मिली राशि से उसने उपरोक्त थ्री व्हीलर सत्तर हजार रुपये में खरीदा था। मां-बाप का इकलौता बेटा अपना काम खुद करना चाहता था। घायल होने के बाद उसे तुरंत उपचार मिल जाता, तो उसकी जान बच सकती थी। मृतक के दो बच्चे हैं। बिड़ला के अनुसार हाईवे का निर्माण करने वाली कंपनी ने एक भी सूचक बोर्ड नहीं लगाया है। जिससे पता चल जाए कि आगे मिट्टी का ढेर है या रास्ता खत्म है। कंपनी की भी लापरवाही उजागर हुई है।
पांच दिन बाद उठनी थी बेटी की डोली, हादसे में पिता की मौत
छह दिन बाद बेटी की डोली विदा करनी थी, आवारा पशुओं ने लील ली पिता की जान
गांव मांगेआना-हैबूआना के बीच वीरवार की रात को हुए हादसे में गांव पन्नीवाला रूलदू निवासी बहादर की दर्दनाक मौत हुई। रात को वह बाइक पर अपनी भांजी को लेने के लिए पंजाब के गांव वडिंगखेड़ा जा रहा था। मार्ग में आवारा पशु से टकराने के बाद वह गंभीर रूप से घायल हो गया। काफी देर तक वह सड़क पर पड़ा तड़पता रहा। गांव हैबूआना के ग्रामीणों ने उपचार के लिए उसे डबवाली के सरकारी अस्पताल में पहुंचाया। प्राथमिक उपचार के बाद उसे सिरसा रेफर कर दिया गया। वहां उसने जख्मों का ताप न सहते हुए दम तोड़ दिया। बहादर की मौत की खबर से गांव में शोक की लहर दौड़ गई। घर पर खुशियों का माहौल गम में बदल गया। दरअसल, बहादर ने अपनी बेटी रमनदीप की शादी 13 जुलाई को तय की हुई थी। घर पर शादी की तैयारियां धूमधाम से चल रही थी। शादी के सिलसिले में वह गांव वडिंगखेड़ा जा रहा था। आवारा पशुओं की वजह से बेटी की डोली उठने से छह दिन पहले ही पिता की अर्थी उठ गई।
एक माह में तीसरा मामला
संवेदनहीनता के यह पहले दो मामले नहीं। इससे पूर्व 17 जून को गांव आसाखेड़ा के नजदीक एक कार अनियंत्रित होकर पेड़ से टकरा गई थी। उस दौरान भी किसी भी राहगीर ने घायलों को मदद नहीं दी। परिणामस्वरूप दो जनों की दर्दनाक मौत हो गई।
अब तक 56 मरे
अवारा पशुओं के चलते हादसों में बढ़ोतरी होने के साथ ही इंसानी जान जाने का ग्राफ लगातार बढ़ता जा रहा है। सरकार समस्या का हल नहीं ढूंढ पाई है। अब तक जिला सिरसा में डेढ़ साल में आवारा पशुओं की वजह से 56 मौत हो चुकी है।