अमेरिकन सुंडी पर काबू पाया तो कॉटन की फसल में पत्ता मरोड़ बीमारी का प्रकोप बढ़ने लगा है। इस बीमारी पर काबू पाने के लिए एशिया के कॉटन वैज्ञानिक मिलकर रिसर्च करेंगे। दो साल बाद वैज्ञानिक अपनी रिपोर्ट इंटरनेशनल कॉटन एडवाइजरी कमेटी (अमेरिका) के तहत गठित एशिया कॉटन रिसर्च एंड डेवलपमेंट नेटवर्क (एसीआरडीएन) को सौंपेंगे। कई देशों में यह सबसे भयंकर बीमारी बनी है। भारत ने इसका कारण पहले ही तलाश लिया था, ऐसे में अब केवल इलाज पर काम बाकी रह गया है।
बांग्लादेश की राजधानी ढाका में 18 से 20 जून को एसीआरडीएन के छठे कॉटन सम्मेलन में कॉटन की पत्ता मरोड़ बीमारी पर विशेष रूप से चर्चा र्हुई। भारत के अलावा पाकिस्तान और चीन समेत कई देशों की ओर से भी इस बीमारी पर चिंता जताई गई। सम्मेलन में निर्णय हुआ कि एशिया के सभी देशों के वैज्ञानिक इस बीमारी पर काबू पाने के लिए आगामी दो वर्षों तक रिसर्च करेंगे।
रिसर्च के दौरान सभी वैज्ञानिक इंटरनेट के माध्यम से अपने अनुभवों को सांझा करते रहेंगे ताकि इस बीमारी पर काबू पाने में सफलता हासिल हो सके। दस प्वाइंट बनाकर उन पर रिसर्च की जाएगी। केंद्रीय कपास अनुसंधान क्षेत्रीय स्टेशन सिरसा के प्रभारी डॉ. दलीप मोंगा ने बताया कि उन्होंने ढाका में हुए कॉटन सम्मेलन में भारत में पत्ता मरोड़ बीमारी पर अपनी प्रस्तुति दी। उन्होंने बताया कि अब शीघ्र ही एशिया स्तर पर होने वाली रिसर्च का लिटरेचर आ जाएगा। उसके बाद इसके इलाज पर रिसर्च शुरू कर दी जाएगी।
भारत में बढ़ा कॉटन उत्पादन
डॉ. मोंगा ने बताया कि भारत में बढ़े कॉटन उत्पादन के बारे में एसीआरडीएन ने खुशी जताई। उन्होंने बताया कि दस वर्ष पूर्व भारत में 160-165 लाख गांठों का उत्पादन होता था, लेकिन अच्छे बीच तैयार किए जाने के बाद अब हमारा देश 365 लाख गांठों के उत्पादन पर जा पहुंचा है। चूंकि पत्ता मरोड़ बीमारी आने से 50 से 70 फीसदी उत्पादन कम हो जाता है, लिहाजा इसका इलाज बेहद जरूरी है। भारत के अलावा चीन और पाकिस्तान आदि देश भी इस बीमारी से जूझ रहे हैं।