धान की पराली जलाने पर प्रदेश सरकार की ओर से लगाए गए प्रतिबंध के खिलाफ मंगलवार को सिरसा किसान बिफर गए। सरकार के फैसले से भड़के किसानों ने कपास मंडी के गेट पर विरोध प्रदर्शन किया। शहर में खट्टर सरकार के पुतले की शव यात्रा निकालकर नारेबाजी करते हुए किसान सुरखाब चौक पहुंचे। यहां पर किसानों ने सरकार के पुतले को आग के हवाले किया।
इसके बाद गुस्साए किसान उपायुक्त कार्यालय पहुंचे और मुख्यमंत्री के नाम नगराधीश को ज्ञापन सौंपा। ज्ञापन में कहा गया है कि धान की पराली को जलाना किसानों का शौक नहीं, मजबूरी है, क्योंकि धान की कटाई के तुरंत बाद ही गेहूं की बिजाई करनी होती है। इसलिए किसानों के पास पराली को जलाने के अतिरिक्त कोई अन्य विकल्प नहीं है। किसान आर्थिक रूप से इतना भी मजबूत नहीं है कि मशीनरी खरीद पाए, इसलिए सरकार को चाहिए कि पराली को जलाने पर लगाई गई रोक को तुरंत वापस लें। किसान नेताओं ने कहा कि धान की पराली जलाने पर लगाई गई रोक को सरकार तुरंत वापिस ले, क्योंकि इसके बिना गेहूं की बिजाई मुश्किल है। धान की खरीद में किसान को तोल और मोश्चर के नाम पर परेशान करना बंद किया जाए। नरम और कपास के रेट कम से कम 10050/-प्रति क्विंटल दिया जाए। नरमा-कपास की सरकारी खरीद शुरू करवाई जाए। प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना, जोकि सफेद हाथी बनकर रह गया है, उसे वापिस लिया जाए। आवारा पशुओं से किसानों की फसलों को बचाया जाए। नहरी पानी महीने में 21 दिन दिया जाए और ट्यूबवेल को 10 घंटे प्रतिदिन बिजली दी जाए। किसानों को कर्ज मुक्त कर आर्थिक संकट से बाहर निकाला जाए। स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट को लागू किया जाए। इसी के साथ सरकार पराली का समाधान करें, अन्यथा किसानों को दस हजार रुपये प्रति एकड़ मुआवजा राशि मुहैया करवाए।
इससे पहले राष्ट्रीय किसान संगठन के नेतृत्व में विभिन्न किसान संगठनों के पदाधिकारियों और सदस्यों सहित सैकड़ों किसानों को संबोधित करते हुए प्रदेशाध्यक्ष जसबीर सिंह भट्टी ने कहा कि पराली जलाने पर सरकार ने रोक लगा दी है, ऐसे में किसान अब पराली को लेकर कहां जाएं? बिजाई का समय भी बीत रहा है। धान के अवशेष उठाने को लेकर सरकार प्रबंध करे नहीं तो कठोर फैसला लिया जाएगा। उन्होंने कहा कि किसानों को प्रशासन व सरकार की ओर से चेतावनी दी जा रही है कि धान की पराली जलाने पर जुर्माना लगेगा व मुकदमा दर्ज होगा, जोकि सरासर गलत है।
किसानों ने सरकार को चेतावनी दी है कि अगर इन मांगों को शीघ्र अतिशीघ्र पूरा नहीं किया जाता है, तो किसानों को संघर्ष की राह अपनानी होगी, जिसकी जिम्मेदारी सरकार की ही होगी। इस अवसर पर विकल पचार, सुरेश कांथ, प्रकाश ममेरा, स्वर्ण सिंह विर्क, गुरदास लकडावाली, वकील सिंह, मलकीत सिंह, जगजीत सिंह, बलजीत सिंह नंबरदार, देवेंद्र बोगिया मौजगढ़, हरचेत सिंह पूर्व सरपंच, लीलाधर, चरणजीत सिंह, जसकरण सिंह पूर्व सरपंच, अमरजीत हवलदार, जगदेव सिंह चेयरमैन, महेंद्र सिंह, लखविंद्र सिंह अलीकां, रामस्वरूप गौरीवाला, जगसीर सिंह सरपंच, नछतर सिंह, मलकीत सिंह मान, सुखचरण बराड़, करनैल सिंह, बलतेज सिंह पूर्व सरपंच, गुरमेल सिंह मटदादू, जसवंत सिंह पटवारी सहित विभिन्न किसान संगठनों के पदाधिकारियों ने अपनी बात रखी।