फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

बोतलों में बंद 210 मौतों का राज

विज्ञापन
विज्ञापन
रोहतक। किसी की मौत के मामले में कारण का पता नहीं लगने पर विसरा लिया जाता है, जिसकी फोरेंसिक लैब में जांच होती है। मगर विसरा रिपोर्ट के इंतजार में ही सालों बीत जाते हैं, जिसका फायदा अपराधी उठाते हैं और परिजनों के पास इंतजार के अलावा कुछ नहीं बचता। वहीं पुलिस यह कहकर मामला टाल देती है कि अभी विसरा रिपोर्ट नहीं आई है। ऐसे एक दो नहीं पिछले तीन साल में रोहतक में हत्या, आत्महत्या और हादसों में हुई मौतों के 210 मामले हैं, जिनकी रिपोर्ट फोरेंसिक साइंस लेबोरेट्री मधुबन में लंबित है। इन मामलों की रिपोर्ट देने में न तो लैब जल्दबाजी कर रही हैं और न ही पुलिस कोई संज्ञान ले रही है। रोहतक में हर साल करीब 60 हत्याएं, 70 सड़क हादसों में मौत, 70 आत्महत्याएं, 40 अज्ञात शव सहित 40 संदिग्ध परिस्थितियों में मौत के मामले सामने आते हैं। इनमें से करीब 200 मामलों में विसरा लिया जाता है। पुलिस के अनुसार 2017, 18 और 19 में करीब 610 विसरा मधुबन लैब में भेजे गए, जिनमें से करीब 400 की रिपोर्ट आ चुकी है जबकि 210 मामलों में रिपोर्ट का इंतजार है।
विज्ञापन

विशेषज्ञों की कमी और पुलिस अनदेखा का रवैया मुख्य वजह
मधुबन से समय पर रिपोर्ट न मिल पाने का सबसे बड़ा कारण विशेषज्ञों की कमी है। लेकिन बड़ी बात यह भी है कि मामलों से संबंधित थानों की पुलिस भी रिपोर्ट मांगने की कोई पहल नहीं कर रही है। बस पीड़ितों से कोर्ट तक में एक ही हवाला दे रही है कि अभी विसरा रिपोर्ट नहीं आई है। प्रदेश में खासतौर से रोहतक में लगातार अपराध का ग्राफ बढ़ने से केसों की संख्या बढ़ती जा रही है। रोहतक के हर माह की यह पेंडेंसी करीब 25 से 28 केसों तक पहुंच रही है। इससे आने वाले समय में केसों की जांच में और देरी हो सकती है। पद खाली हो रहे हैं और प्रदेश में अपराध के नए तरीके अपराधी अपना रहे हैं। ऐसे में एक्सपर्ट के लिए और भी चुनौती है। प्रदेश सरकार को समय से रिक्त पदों को भरने की प्रक्रिया पूरी करनी होगी, नहीं तो पेंडिंग केसों का आंकड़ा लगातार बढ़ता जाएगा।
ऐसे होती है जांच
मौत के कारण जानने के लिए एक प्रक्रिया के तहत काम किया जाता है। इसमें पोस्टमार्टम करने के दौरान शव के विसरल पार्ट यानी किडनी, लीवर, दिल, पेट के अंगों का सैंपल लिया जाता है, इसे विसरा कहते हैं। विसरे को जांच के लिए केमिकल एक्जामिनर के पास भेजा जाता है। जांच में यह पता लगाया जाता है कि मौत किस तरह और किस कारण से हुई थी। केमिकल एक्जामिनर यह देखता है कि जिसके शव का विसरा है, उसकी मौत किस समय हुई, बताई किस समय गई। अंगों का रंग, कोशिकाओं की सिकुड़न, पेट में मिले खाने के अवशेष के आधार पर कई तरह की अहम जानकारी उपलब्ध होती है। विसरे की जांच होने पर ही आरोपी के खिलाफ एक्शन लिया जाता है या अदालत में केस की सुनवाई के दौरान सबूत के तौर पर रिपोर्ट को प्रस्तुत किया जाता है।
विज्ञापन

इन परिस्थितियों में विसरे की जांच होती है
बीमार होने के अलावा अगर किसी की मौत जलने से, जहर निगलने से, गोली लगने से, गला रेतने से, करंट लगने से, दुष्कर्म या डूबने से होती है तो इन परिस्थितियों में शक के आधार पर पुलिस की मांग पर विसरा केमिकल एक्जामिनर के पास भेजा जाता है। रिपोर्ट देरी से आने से केस लंबित रह जाते हैं।
विसरा रिपोर्ट आने के बाद ही चालान पेश किया जाता है। विसरा रिपोर्ट के इंतजार में लंबे समय तक केस अधर में लटका रहता है। जिले के ऐसे अनेक मामलों की विसरा रिपोर्ट आनी बाकी है। - गौरखपाल, डीएसपी मुख्यालय।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें