रोहतक। कोई तनाव में है तो कोई गुस्से में। कोई परेशान है तो कोई उदास। नए दौर में लोगों में ये नई समस्याएं सामने आ रही हैं। कोविड में ये मामले सुनामी की तरह बढ़े। महामारी का असर अब भी है। यही वजह है कि मानसिक रोगी बढ़ रहे हैं। हालात ये हैं कि औसतन एक परिवार में एक मानसिक रोगी है। इस स्थिति में मनोचिकित्सक व मनोवैज्ञानिक ही नहीं, खुद विश्व स्वास्थ्य संगठन भी चिंतित है। इसलिए इस वर्ष विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस का थीम विश्व में सभी के मानसिक स्वास्थ्य व खुशहाल जिंदगी का संकल्प रखा है। अमर उजाला ने मानसिक स्वास्थ्य को लेकर राज्य मानसिक स्वास्थ्य संस्थान के निदेशक कम सीईओ डॉ. राजीव गुप्ता से बातचीत की तो यह सच सामने आया।
कोविड ने हमारे जीवन को पूरी तरह प्रभावित किया है। महामारी में समाज का बड़ा वर्ग मानसिक रोगी बन गया है। राज्य मानसिक स्वास्थ्य संस्थान के आंकड़ों पर नजर डालें तो यहां की ओपीडी में रोजाना औसतन 150 मानसिक रोगी आ रहे हैं। इनमें से 70 नए मरीज होते हैं। यह भी वह संख्या है, जिनमें मानसिक रोग खतरनाक स्तर तक बढ़ गया है। इससे कहीं ज्यादा सामान्य मानसिक रोगी घरों में हैं। उन्हें या तो मानसिक रोग की जानकारी ही नहीं है, या फिर वे मानसिक रोग को छिपाते हैं। ये दोनों की स्थितियां खतरनाक हैं।
आदर्श स्वास्थ्य से हम कोसों दूर, ढांचागत सुविधाएं भी कम
आधुनिक प्रतिस्पर्धा भरे दौर में मानसिक रोग जिस रफ्तार से बढ़ रहे हैं, यह चिंता का विषय है। इसकी बड़ी वजह इन बढ़ती मरीजों की फौज से निपटने के पर्याप्त संसाधन हैं। कोरोना महामारी के बाद भी हम आदर्श स्वास्थ्य से कोसों दूर हैं। मरीजों के लिए ढांचागत सुविधाएं भी कम हैं। इसमें पर्याप्त चिकित्सक, विशेषज्ञ, अस्पताल व अन्य संसाधन शामिल हैं। ऐसे में मानसिक रोगों के प्रगति जागरूकता ही बेहतर विकल्प है। इसी कड़ी में राज्य मानसिक स्वास्थ्य संस्थान विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस पर नौ से 15 अक्तूबर तक लोगों को जागरूक बनाने के उद्देश्य से विभिन्न गतिविधियों का आयोजन कर रहा है।
अपने स्वास्थ्य पर करना होगा निवेश
बदलते दौर में हम सुविधापरक हो चले हैं। हर काम खुद करने की बजाय दूसरों से खासकर मशीनों से करने लगे हैं। फिर वह घर की सफाई हो, अल सुबह उठकर गृहिणी का गेहूं पीसना, दही बिलोने समेत अन्य कोई काम। पहले बच्चे 10 से 15 किलोमीटर तक साइकिल से स्कूल जाते थे। अब घर के बाहर से बस में जाते हैं। बचपन आरामपरस्त होने से बच्चे भी नाजुक हो गए हैं। यही नहीं, अब हम ऑनलाइन भी हो गए हैं। इस कारण कुछ खरीदना हो, कोई जानकारी लेनी हो या अन्य काम, सब घर में बेड पर लेटे हुए या कुर्सी पर बैठ कर रहे हैं। इस कारण हमारा स्वस्थ जीवन खत्म हो गया है। नतीजतन शरीर आरामपरस्त होकर मोटा व बेकार होने लगा है।
वर्जन:
मानसिक रोगी बढ़ रहे हैं। कोविड में इसकी सुनामी आई थी। अब भी मनोरोग पीड़ित इलाज के लिए आ रहे हैं। ऐसे मरीज गंभीर स्थित में ही अस्पताल आते हैं। जबकि इससे बड़ी संख्या घरों में है। हमें अपनी पुरानी परंपराओं की ओर लौटना होगा। आरामपरस्त न होकर शारीरिक गतिविधियां करनी होंगी। खुशहाल रहने का प्रयास खुद करना होगा।
- डॉ. राजीव गुप्ता, निदेशक कम सीईओ, एसआईएचएम।