रोहतक। पिछले कुछ वर्षों में शहर में थिएटर ने तेजी से विकास किया है। जहां पहले स्कूलों और कॉलेजों में थिएटर को लेकर जागरूकता कम थी। वहीं, अब नई पीढ़ी तेजी से इससे जुड़ रही है और इसे कॅरिअर के रूप में भी अपना रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि रंगमंच अब केवल मनोरंजन या अभिनय तक सीमित नहीं रहा बल्कि यह शिक्षा, व्यक्तित्व विकास और सामाजिक बदलाव का सशक्त माध्यम बन चुका है। डिजिटल और ओटीटी के बढ़ते प्रभाव के बावजूद लाइव थिएटर का आकर्षण और उसका रसभाव आज भी दर्शकों को बांधे रखता है। संवाद
थिएटर एक खूबसूरत जीवन जो अंतर्मन से जोड़ता है : दीपा
एनएसडी 2024 बैच से जुड़ी दीपा 15 वर्षों से थिएटर के क्षेत्र में सक्रिय हैं और बच्चों व युवाओं को प्रशिक्षण दे रही हैं। दीपा ने बताया कि 2017 में जब वह वैश्य महिला महाविद्यालय और आईसी कॉलेज के छात्रों के साथ यूथ फेस्टिवल आयोजित करती थीं, तब थिएटर के लिए जागरूकता फैलानी पड़ती थी लेकिन आज स्थिति काफी बदल चुकी है।
अब नई पीढ़ी खुद रंगमंच की ओर आ रही है। थिएटर अब शिक्षा का हिस्सा बन चुका है, इसमें ग्रेजुएशन से लेकर पीएचडी तक की पढ़ाई हो रही है। उन्होंने कहा कि थिएटर केवल मंच नहीं बल्कि एक मेडिटेशन है जो व्यक्ति को अपने अंतर्मन से जोड़ता है। रटने के बजाय थिएटर एक्टिविटी के जरिए हर विषय को रोचक बनाया जा सकता है। बच्चों का आत्मविश्वास और सोचने की क्षमता बढ़ती है।
दीपा ने यह भी साझा किया कि शुरुआती दौर में परिवार में इस क्षेत्र को लेकर समझ नहीं थी और इसे केवल ग्लैमर से जोड़कर देखा जाता था लेकिन 10 साल के संघर्ष के बाद आज परिवार का पूरा सहयोग मिल रहा है। वह रोहतक, दिल्ली और चंडीगढ़ में प्रशिक्षण दे रही हैं और बुजुर्गों व युवाओं के लिए निशुल्क वर्कशॉप भी आयोजित करती हैं।
स्कूलों में थिएटर जरूरी, तभी भटकाव से बचेंगे युवा : डॉ. दुष्यंत
सुपवा की फिल्म एंड टेलिविजन फैकल्टी के वरिष्ठ प्राध्यापक डॉ. दुष्यंत सिंह ने कहा कि रंगमंच समाज को दिशा देने का सशक्त माध्यम है। उन्होंने राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से प्रशिक्षण लिया है और पिछले 30 वर्षों से थिएटर, फिल्म और अभिनय के क्षेत्र में सक्रिय हैं।
उन्होंने कहा कि आज के समय में ओटीटी और डिजिटल प्लेटफॉर्म के कारण युवा जल्दी सफलता और अधिक पैसे की ओर आकर्षित हो रहे हैं। रील्स और डिजिटल कंटेंट से मनोरंजन तो मिलता है लेकिन संतुष्टि नहीं मिलती। लाइव थिएटर का अनुभव अलग होता है जहां कलाकार और दर्शक के बीच सीधा जुड़ाव होता
स्कूलों और कॉलेजों में थिएटर को अनिवार्य रूप से शामिल किया जाना चाहिए। अगर बच्चों को शुरू से ही रंगमंच से जोड़ा जाए तो उनका रचनात्मक विकास होगा और वे भटकाव से दूर रहेंगे। कला को शिक्षा का हिस्सा बनाना समय की जरूरत है।
उन्होंने साहित्य और रंगमंच के संबंध पर भी प्रकाश डालते हुए कहा कि प्रेमचंद, रवींद्रनाथ टैगोर जैसे लेखकों के साहित्य और नाटकों से समाज को नई दिशा मिलती है। रंगमंच एक बेहतर और संवेदनशील समाज के निर्माण की ओर पहला कदम है।