रोहतक। पीजीआई में ब्रेस्ट कैंसर की जांच के लिए लगी मेमोग्राफी मशीन जर्जर पड़ी है। विडंबना देखिये कि कैंसर की सटीक जांच के लिए बेहद जरूरी इस जांच का यहां कोई विकल्प नहीं है। मरीजों को निजी जांच केंद्रों के हवाले किया जा रहा है। वहां जांच के बदले 3000 चुकाने पड़ रहे हैं।
पीजीआई में हर साल 600 महिलाएं ब्रेस्ट कैंसर की जांच व इलाज के लिए पहुंचती हैं। इनमें करीब 300 की सर्जरी करनी पड़ती है। संस्थान में ब्रेस्ट कैंसर का इलाज सर्जरी व कीमोथेरेपी से होता है। इलाज से पहले की सबसे जरूरी जांच है, मैमोग्राफी। यह स्क्रीनिंग है जो कैंसरग्रस्त हिस्से का सटीक पता देती है।
पीजीआई में यह मशीन लंबे समय से खराब है। संस्थान के एक डॉक्टर बताते हैं कि यहां पंजाब, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश और उत्तर प्रदेश से भी मरीज पहुंचते हैं। जांच यहां हो नहीं सकती। मजबूरन उन्हें निजी डायग्नोस्टिक सेंटर से मैमोग्राफी कराने के लिए कहना पड़ता है।
आयुष्मान योजना की लाभार्थी महिलाओं को पीजीआई में ब्रेस्ट कैंसर की सर्जरी कराने पर अपनी जेब से तीन-चार हजार रुपये ही खर्च करने पड़ते हैं। बाकी का सारा भुगतान योजना के जरिये हो जाता है। वहीं, निजी अस्पतालों में यही सर्जरी कराने पर करीब साढ़े तीन लाख रुपये तक खर्च हो जाते हैं। संवाद
पुरानी कोबाल्ट मशीनों से की जा रही सिकाई
कई गंभीर मरीजों की सर्जरी के दौरान ब्रेस्ट भी निकालना पड़ जाता है। सामाजिक कारणों और शारीरिक सुंदरता को ध्यान में रखते हुए पीजीआई ऐसे मरीजों में कृत्रिम ब्रेस्ट भी लगाता है। सर्जरी के बाद सिकाई करनी होती है लेकिन इसके लिए भी उपयुक्त आधुनिक मशीन नहीं है। वर्षों पुरानी कोबाल्ट मशीनों से ही सिकाई की जा रही है। इनमें से अधिकतर खराब भी रहती हैं। इससे मरीजों को निजी अस्पतालों में जाना पड़ता है। संस्थान में लीनियर एक्सीलेटर मशीन की मांग है। इसका भवन भी बन चुका है।
मैमोग्राफी की मशीन काफी पुरानी है। इसके कारण बाहर से जांच लिखनी पड़ रही हैं। शासन से रेडियोग्राफी, न्यूक्लियर मेडिसिन व रेडियोथेरेपी के लिए कई मशीनों की मांग की है। इसके बाद ही राहत संभव हो सकेगी।
-डॉ. एसके सिंघल, निदेशक पीजीआई