रोहतक। सुपवा में बुधवार को आयोजित नाटक उमर का परवाना का निर्देशन कर रहे डॉ. आदिश कुमार वर्मा ने कहा कि जीवन का पहला रंगमंच घर से शुरू होता है और माता-पिता ही व्यक्ति के असली निर्देशक होते हैं। उन्होंने नाटक, लोक संस्कृति और आधुनिक दौर में रंगमंच की भूमिका पर विस्तार से बातचीत की।
उमर का परवाना नाटक की शुरुआत कैसे हुई?
जब मैं राजस्थान के हनुमानगढ़ स्थित राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से जुड़ा था, तभी विचार आया कि राजस्थान की संस्कृति को मंच पर लाया जाए। विजयदान देथा जिन्हें राजस्थान का विलियम शेक्सपियर कहा जाता है, उनकी 800 से अधिक कहानियां हैं। उन्हीं की एक छोटी सी लोककथा उमर का परवाना ने मुझे प्रभावित किया। यह कहानी दादी-नानी की सुनाई जाने वाली जादू-टोने और लोक विश्वासों से जुड़ी है। हमने पारंपरिक लोक संस्कृति, लोक संगीत और दृश्यात्मक तत्वों के माध्यम से इसे दर्शकों के सामने प्रस्तुत करने का प्रयास किया है।
नाटक का मुख्य संदेश क्या है?
आज हम अति आधुनिकता की ओर बढ़ रहे हैं लेकिन बच्चों को पहले अपनी संस्कृति को समझना चाहिए। संस्कार परिवार से शुरू होते हैं। अगर जीवन का नाटक समझना है तो घर से मिले मूल्यों को समझना जरूरी है। रंगमंच आपको दुनिया में पहचान दिलाता है लेकिन असली रंगमंच माता-पिता सिखाते हैं। मेरा मानना है कि अगर बच्चा रोएगा नहीं तो मां दूध नहीं पिलाएगी। अभिनय और अभिव्यक्ति की शुरुआत यहीं से हो जाती है।
टीम और प्रस्तुति के बारे में बताएं।
इस नाटक की टीम में कुल 33 सदस्य हैं जिनमें हिमाचल, बिहार, हरियाणा, दिल्ली, राजस्थान, असम सहित विभिन्न राज्यों के छात्र शामिल हैं। हमारी टीम में छह अंतरराष्ट्रीय छात्र भी हैं। सभी मिलकर एक ही भाषा और संस्कृति को सीखने का प्रयास कर रहे हैं। कहानी भले ही 5-7 पृष्ठ की है लेकिन डेढ़ घंटे की प्रस्तुति के लिए गहन अभ्यास किया गया।
लोक संस्कृति लुप्त क्यों हो रही है?
लोगों की रुचि कम हो रही है और उन्हें यह दिखाया नहीं जा रहा। मेरा मानना है कि जो दिखेगा, वही बिकेगा। अगर हम अपनी संस्कृति को मंच नहीं देंगे तो वह लोगों तक कैसे पहुंचेगी? इसे आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी हम सबकी है।
अपने रंगमंच के सफर के बारे में बताएं?
मैं 2006 से राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी) से जुड़ा था। 2009 में शिक्षण कार्य में आया। एलपीयू लुधियाना में विभाग की शुरुआत की और सात वर्ष तक पढ़ाया। सिरसा विश्वविद्यालय, सिटी यूनिवर्सिटी लुधियाना और पंजाब के अन्य संस्थानों में भी ड्रामा विषय शुरू करवाने में योगदान दिया। अब केंद्रीय विश्वविद्यालय पंजाब में सहायक प्रोफेसर के रूप में कार्यरत हूं। अब तक 52-53 नाटकों का निर्देशन कर चुका हूं और 34 शोध पत्र प्रकाशित हैं।
बॉलीवुड और रंगमंच के अनुभव में क्या अंतर है?
मेरी डिग्री एमए थिएटर इन टेलीविजन में है। मैंने टीवी सीरियल लेफ्ट राइट और ये रिश्ता क्या कहलाता है में सहयक डायरेक्टर के रूप में काम किया है, साथ ही विवाह में भी कार्य किया। बॉलीवुड में लोग अधिक इसलिए जाते हैं, क्योंकि वहां पैसा ज्यादा है लेकिन रंगमंच आपको जीना सिखा देता है।