रोहतक। पीजीआईएमएस के डॉक्टरों ने युवक की गर्दन में फंसा 20 सेंटीमीटर लंबा लकड़ी का टुकड़ा निकालकर उसे नया जीवन दिया है। पेड़ पर लकड़ियां काटते समय गिरे युवक की गर्दन को चीरते हुए लकड़ी का टुकड़ा कान से बाहर निकल आया था। डॉक्टरों की टीम ने शनिवार को दो घंटे के ऑपरेशन में खून की दो व चेहरे की नस को सुरक्षित करते हुए लकड़ी का टुकड़ा बाहर निकाला। मेडिकल कॉलेज अग्रोहा हिसार से रेफर किया गया मरीज शुक्रवार रात धनवंतरी अपैक्स ट्रॉमा सेंटर में आया था। अब मरीज अपने मुंह से खाना खाने लगा है।
फतेहाबाद के भौड़ियाखेड़ा निवासी 36 वर्षीय प्रेम शुक्रवार को पेड़ पर चढ़ कर लकड़ी काट रहा था। इस दौरान संतुलन बिगड़ने से वह नीचे गिर गया। पेड़ के नीचे पड़ी लकड़ियों में से करीब 20 सेंटीमीटर लंबा व तीन से चार सेंटीमीटर चौड़ा लकड़ी का टुकड़ा उसकी गर्दन में धंस गया। इसका एक सिरा अंदर से गर्दन को चीरते हुआ कान से बाहर निकल आया। आसपास के लोग उसे गंभीर हालत में अस्पताल ले गए। यहां से उसे मेडिकल कॉलेज अग्रोहा हिसार भेज दिया गया। डॉक्टरों ने यहां उसकी हालत नाजुक होने के चलते उसे पीजीआई रेफर कर दिया। शुक्रवार को देर रात खून से लथपथ यह मरीज ट्रॉमा सेंटर पहुंचा। यहां सीटीवीएस विभाग के डॉ. संदीप ने मरीज की जांच की व उसे स्थिर किया।
डॉ. वीरेंद्र ने लिया ऑपरेशन का फैसला
प्रारंभिक जांच व प्राथमिक देखभाल के बाद मरीज को डेंटल कॉलेज के ओरल सर्जरी विभाग में भेजा गया। यहां ओरल सर्जरी विभाग के अध्यक्ष डॉ. वीरेंद्र सिंह ने मरीज की जांच कर लकड़ी के टुकड़े को हटाने के लिए ऑपरेशन का फैसला लिया। इसके लिए तुरंत टीम बनाई गई। इसमें प्रो. अमरीश भागोल, डॉ. विक्रम व डॉ. आकाश शामिल है। इन सभी ने शनिवार सुबह मरीज की सर्जरी की। ट्रॉमा सेंटर प्रभारी डॉ. सुरेश सिंघल, डॉ. प्रशांत कुमार व डॉ. मनीषा ने मरीज को एनेस्थीसिया दिया।
चुनौतीपूर्ण था गले से लकड़ी का टुकड़ा निकालना
एनेस्थीसियोलॉजी और ओरल सर्जरी टीम दोनों के लिए यह केस चुनौतीपूर्ण था। प्रारंभिक चुनौती गर्दन की न्यूनतम गति के साथ रोगी को नली लगाना (इंटुबैट करना) था। सर्जिकल टीम के समक्ष गर्दन की खून की दो नसों व चेहरे की तंत्रिका को नुकसान पहुंचाए बगैर लकड़ी के टुकड़े को निकालने की चुनौती थी। गर्दन और चेहरे की तीन मुख्य नसों के अलावा जरूरी तंत्रिकाओं को सावधानीपूर्वक एक ओर किया गया। इसके बाद लकड़ी के टुकड़े को धीरे-धीरे ढीला कर बाहर निकाला गया। खून की नस क्षतिग्रस्त होने से मरीज की जान का खतरा था। चेहरे की नस क्षतिग्रस्त होने से मरीज का चेहरा टेढ़ा हो सकता था। इनको ध्यान में रखते हुए सावधानी पूर्वक सफल ऑपरेशन किया गया।
- डॉ. वीरेंद्र सिंह, ओरल सर्जरी, पीजीआईडीएस।
पीजीआई की टीम का जताया आभार
गले में लकड़ी का टुकड़ा ऐसा फंसा था कि जान निकल रही थी। खून बहने से ज्यादा दर्द से बुरा हाल था। पेड़ से गिरने के बाद पता नहीं क्या हुआ, मुझे कुछ नहीं पता। बस दर्द से चिल्ला रहा था। बर्दाश्त नहीं हो रहा था। पीजीआई के डॉक्टरों ने मुझे बचा लिया। मेरी पत्नी राजबाला, बेटी सावित्री, रिंकू, बेटा वीरपाल व शिवम इनके आभारी हैं।
- प्रेम, भौड़ियाखेड़ा, फतेहाबाद।