संवाद न्यूज एजेंसी
रोहतक। कहते हैं जीवन का दूसरा नाम संघर्ष है। जीवन के इसी संघर्ष में शहर के संजय नगर की रीना गुलाबी ऑटो से रफ्तार भर रहीं हैं। वर्ष 2016 में जब उन्होंने ऑटो चलाना सीखा तो कुछ लोगों ने ताने देकर कहा था कि महिला होकर ऑटो चलाओगी। यह तो पुरुषों का काम है।
12वीं पास रीना ने आस-पड़ोस के लोगों के इन तानों की परवाह किए बिना न केवल ऑटो चलाना सीखा बल्कि इसे स्वरोजगार का साधन भी बनाया है। पति मोहन भले ही मजदूरी करते हैं लेकिन उन्होंने ऑटो चलाने में उनका सहयोग किया। वह केवल रोहतक शहर में ही नहीं बल्कि साल में एक बार परिवार सहित हरिद्वार तक ऑटो में जाने लगी हैं।
रीना कहती हैं कि ऑटो चलाने में क्या शर्म, परिवार का पेट तो पालना ही है। फिलहाल वह रेलवे स्टेशन से बस स्टैंड व आसपास के गांवों तक भी ऑटो में सवारी ले जाने लगी हैं। वह प्रति माह लगभग 10 हजार रुपये तक कमा रही हैं।
बड़ी बहन मीना से ड्राइविंग सीखी
रीना बताती हैं कि उनकी बड़ी बहन मीना को पहले से ड्राइविंग आती थी, उनसे ही उन्होंने ड्राइविंग सीखी। शुरुआत में उनको कुछ डर अवश्य लगता था लेकिन अब वह आसानी से ऑटो चलाती हैं। शुरुआत में उन्होंने लोन पर ऑटो लिया। नौ साल से ऑटो चला रहीं रीना के लिए यही अब स्वरोजगार का जरिया बन गया है। शुरुआत में केवल महिला यात्रियों ही बैठाती थीं लेकिन बदलती परिस्थितियों के चलते ऑटो में सभी यात्रियों को उनके गंतव्य तक ले जाती हैं।
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यूं बढ़ गया संघर्ष
वर्ष 2019 में उनके पति व परिवार सदस्यों का किसी के साथ झगड़ा हो गया और पुलिस ने उनको पकड़ लिया था। तब रीना के ऊपर परिवार की जिम्मेदारी और बढ़ गई। उन्होंने परिवार भी संभाला और घर का खर्च भी निकाला। वह अब सुबह 6 से शाम के 6 बजे तक ऑटो चलाती हैं।