संवाद न्यूज एजेंसी
बहादुरगढ़। सावन का महीना शुरू होते ही पेड़ों पर पड़ने वाली पींगें अब दिखाई नहीं देतीं और न ही हरियाली तीज पर महिलाओं के लोकगीत सुनाई देते हैं। भागदौड़ भरी जिंदगी में त्योहारों की परंपराएं सिकुड़ने के साथ धीरे-धीरे खत्म होती जा रही हैं। हरियाणवी संस्कृति के प्रमुख त्योहार तीज को लेकर कहावत है कि ‘आगी तीज, बिखेर गई त्योहारों का बीज’। इस त्योहार पर झूला झूलने की परंपरा कई दशकों पुरानी है। अब न परिवार पहले की तरह एकजुट हैं और न महिलाएं त्योहारों पर एक साथ जुटती हैं। ऐसे में कई परंपराएं केवल नाम तक सिमट गई हैं। 15 अगस्त को तीज का पर्व मनाया जाएगा, लेकिन क्षेत्र में अब तक एक भी स्थान पर झूले दिखाई नहीं दे रहे हैं।
दो दशक पहले शहर में जगह-जगह पड़ते थे झूले
करीब दो दशक पहले बहादुरगढ़ में तीज के त्योहार से कई दिन पहले झूले डाल दिए जाते थे। रेलवे स्टेशन के नजदीक, काठ मंडी स्थित शिव-हनुमान मंदिर, मेला ग्राउंड, जटवाड़ा मोहल्ला, नजफगढ़ रोड की बैंक कॉलोनी और बालौर रोड समेत कई स्थानों पर पेड़ों पर झूले पड़ते थे। यहां महिलाओं और युवतियों की भीड़ लगी रहती थी। अब न झूले दिखाई देते हैं और न ही लोगों में झूला झूलने का पहले जैसा उत्साह है।
गांवों में भी सिमट रहा त्योहारों का महत्व
एक दशक पहले तक गांवों में तीज का पर्व बड़े उत्साह से मनाया जाता था। तीज से पखवाड़ा पहले ही युवतियां पेड़ों, पुराने मकानों की दहलीज और अन्य स्थानों पर पींगें डालकर झूला झूलती थीं। सावन आते ही पेड़ों पर झूले पड़ जाते और महिलाएं सावनी फुहारों के बीच गीत गाते हुए पींगों पर हुलारे लेती थीं। किसकी पींग सबसे ऊंची जाएगी, इसे लेकर भी होड़ रहती थी। गांवों में जोहड़ के आसपास के बड़े पेड़ों की डालें पींगों से अट जाती थीं।
रंग-बिरंगे परिधानों में सजती थीं युवतियां
लालचंद कॉलोनी निवासी 80 वर्षीय कमला देवी का कहना है कि रंग-बिरंगे परिधानों में सजी युवतियां पींगों पर हुलारे लेती थीं और लोकगीतों से वातावरण गूंज उठता था। समय के साथ आधुनिकता की चकाचौंध ने पारंपरिक मनोरंजन और रवायतों को पीछे छोड़ दिया। महिलाओं के मन में सावन के झूलों की यादें आज भी बसी हैं।
त्योहारों पर पहले जैसा नहीं रहा माहौल
झाड़ौदा गांव निवासी 81 वर्षीय रामदेई का कहना है कि किसी भी त्योहार पर अब पहले जैसा माहौल नहीं रहा। सावन आते ही झूले पड़ जाते थे। तीज से कई दिन पहले महिलाओं की टोलियां गीत गाते हुए झूला झूलती थीं, लेकिन आज जीवनशैली बदल गई है और पुरानी परंपराएं पीछे छूट रही हैं। किसी को भी किसी से बात करने की फुर्सत नहीं है।
-फोटो 85 : कमला देवी