ओलंपिक का टिकट कटाने वाले पहलवान संदीप तोमर रियो में गोल्ड जीतने का अपना इतिहास दोहराना चाहते हैं। फर्क केवल इतना है कि पहले उन्होंने इंटरनेशनल कप में गोल्ड जीता था, इस बार ओलंपिक में गोल्ड जीतना चाहते हैं। इस बार संदीप को रियो के वातावरण और खाने की परेशानी से भी नहीं जूझना पड़ेगा। रियो में पहले खेलने की वजह से उसे इसका फायदा मिल सकता है। ओलंपिक में देश को गोल्ड मेडल दिलाने के लिए संदीप अखाड़े से लेकर जिम तक में 12 घंटे पसीना बहा रहे हैं।
उत्तर प्रदेश के बागपत निवासी पहलवान संदीप तोमर 14 साल की उम्र में ही अखाड़े में उतर गये थे। शुरूआती दांवपेंच गांव के अखाड़े में सीखने के बाद हरियाणा का रुख किया था। इसके बाद रोहतक के मेहर सिंह अखाड़े में प्रैक्टिस शुरू की। यहां कुश्ती के ऐसे दांवपेंच सीखे कि कॉमनवेल्थ, एशियन, इंटरनेशनल कप, मिलेट्री कैंप कुश्ती खेलों का चैंपियन बन गया। अब संदीप तोमर ने ओलंपिक के लिए टिकट हासिल कर लिया है। रियो के माहौल का संदीप को बड़ा फायदा हो सकता है, क्योंकि उसने साल 2012 में रियो में आयोजित इंटरनेशनल कप में भाग लिया था। यहां पर संदीप ने गोल्ड मेडल जीता था। उस समय संदीप को शुरूआत के दिनों में रियो के वातावरण और खानपान के संबंध में परेशानी हुई थी। लेकिन उसने खुद को उसमें ढाल लिया था। इस बार ओलंपिक में संदीप को इसका फायदा मिलेगा, जिससे वह अपने खेल पर फोकस कर सकता है। संदीप बताते हैं कि ओलंपिक में गोल्ड जीतना उसका सबसे बड़ा सपना है। यह जुनून उसके सिर पर चढ़ा हुआ है, जिसको पूरा करने के लिए वह दिन में 12 घंटे पसीना बहा रहा है।
संदीप के दादा, पिता और ताऊ भी पहलवान
संदीप तोमर के बड़ा पहलवान बनने में सबसे अहम यह रहा कि उसके दादा, ताऊ और पिता पहलवान रहे हैं। संदीप के दादा सुल्तान पहलवानी करते थे। उन्होंने अपने बेटों अतल सिंह और हरपाल सिंह को अखाड़े में उतरा। हालांकि संदीप के ताऊ और पिता ज्यादा आगे नहीं बढ़ सके, क्योंकि उनको पहलवानी के साथ-साथ खेती भी करनी होती थी। संदीप को पहलवान बनाने का सपना पिता हरपाल सिंह ने संजोया था। पिता के सपने को पूरा करने के लिए संदीप कड़ी मेहनत कर रहा है।
10 मई से बहालगढ़ में जुटेंगे पहलवान
ओलंपिक में क्वालीफाई करने वाले सभी पहलवानों के अलावा साई की ओर से खेलने वाले अन्य पहलवान 10 मई से बहालगढ़ में जुटेंगे। यहां सभी ओलंपिक में पदक जीतने के लिए नये दांवपेंच सीखेंगे। इसी साल अगस्त में होने वाले रियो ओलंपिक के लिए ज्यादा समय नहीं बचा है लेकिन जितना भी समय बचा है, उसे पहलवान जाया नहीं करना चाहते हैं।