संवाद न्यूज एजेंसी
रेवाड़ी। आधुनिकता की दौड़ में लोग ग्राम्य संस्कृति, संस्कार और प्रकृति से दूर होते जा रहे हैं। ऐसे में ढालियावास गांव निवासी सुरेश प्रजापति ने परंपरा, प्रकृति और पहचान को संजोने का एक अनूठा प्रयास किया है। उन्होंने छप्पर का कच्चा घर बनाया है जो लोगों को ग्राम्य जीवन के प्रति लोगों को जागरूक करता है।
यह छप्पर संग्रहालय जैसा प्रतीत होता है जहां ग्रामीण संस्कृति की हर झलक दिखाई देती है। इसमें हाथ से चलने वाली आटा चक्की, लालटेन, रेशम की रस्सियों वाली चारपाई, मिट्टी की दीवारें, गोबर का लेप और सरकंडों की छत शामिल है। इन पारंपरिक तत्वों की मौजूदगी यह साबित करती है कि तकनीक के दौर में भी पुराने समय की उपयोगिता और सुंदरता कम नहीं हुई है।
सुरेश ने छप्पर के आसपास गमलों में पौधे लगाए हैं और बेले चढ़ाई हैं। सुरेश प्रजापति ने यह पहल आने वाली पीढ़ी को प्रेरणास्रोत है। इसका मकसद लोगों को प्रकृति और ग्राम्य संस्कृति से जोड़ना है।
सुरेश ने बताया कि जो भी इस छप्पर के बारे में सुनता है, देखने जरूर आता है और कुछ पल के लिए ही सही, लेकिन ग्राम्य जीवन के सुख को महसूस करता है। आज यह छप्पर गांव ही नहीं, बल्कि आसपास के शहरी क्षेत्रों से आने वाले लोगों के लिए भी आकर्षण का केंद्र बन गया है। यह छप्पर एक संदेश है पुराना सिर्फ बीता हुआ कल नहीं, हमारी पहचान का आईना होता है। संवाद
आइडिया कोरोना में आया
सुरेश प्रजापति हुडा डिपार्टमेंट में सुपरवाइजर हैं। उनको ये आइडिया कोरोना में आया था। उस दौरान नक्शा बनाया था। पटौदी में रिश्तेदार ने भी इसी तरह से बनाया हुआ है। लागत पर कहा कि झोपड़ी में कच्ची ईंट लगी है। 1 लाख की लागत आई है। दो साल बनाने में लगे हैं। पिछली बार जब गर्मी पड़ी है, उसमें जो पौधे लगाए थे वो नष्ट हो गए थे। इस बार गर्मी से बचने के इंतजाम किए गए हैं। परिवार में दो लड़के, एक लड़की, एक पुत्रवधू ओर एक पोता है। आगे इसे ग्रीन पार्क बनाएंगे।