रोहतक। पीजीआई की थैलेसीमिया विशेषज्ञ डॉ. अल्का यादव ने कहा कि थैलेसीमिया जैसी गंभीर आनुवंशिक बीमारी अब तेजी से फैल रही है। गर्भ में ही बच्चे की जांच (प्रीनेटल स्क्रीनिंग) कराने पर इसके खतरे से बचा जा सकता है। हर साल 50 से 60 नए मरीज संस्थान में इलाज के लिए पहुंच रहे हैं।
आमतौर पर जन्म के छह माह से एक साल के अंदर ही बच्चों में इसके लक्षण दिखने लगते हैं। राहत की बात यह है कि आधुनिक जांच सुविधाओं व बढ़ती जागरूकता के कारण अब मामलों की पहचान जल्द हो रही है। थैलेसीमिया से पीड़ित बच्चों के लिए अब बेहतर ब्लड ट्रांसफ्यूजन (खून चढ़ाना) व चिलेशन थेरेपी (शरीर से अतिरिक्त आयरन निकालना) की व्यवस्था की जा रही है।
कुछ सालों से केसों में बढ़ोतरी हो रही
डॉ. अल्का ने बताया कि पिछले कुछ वर्षों में थैलेसीमिया के केसों में बढ़ोतरी हुई है। जांच केंद्रों का बढ़ना व लोगों का जागरूक होना इसका कारण है। थैलेसीमिया ऐसी बीमारी है जो माता-पिता से बच्चों में पहुंचती है। इसमें शरीर में हीमोग्लोबिन ठीक से नहीं बनता जिससे खून की भारी कमी (एनीमिया) हो जाती है।
शादी से पहले या गर्भधारण के समय की जा रही माता-पिता की काउंसिलिंग
इस बीमारी को जड़ से रोकने के लिए प्रशासन अब कड़े कदम उठा रहा है। डायग्नोस्टिक सेंटरों को बढ़ाया जा रहा है ताकि समय पर पहचान हो सके। गर्भ में ही बच्चे की जांच (प्रीनेटल स्क्रीनिंग) पर जोर दिया जा रहा है। शादी से पहले या गर्भधारण के समय माता-पिता को काउंसिलिंग के माध्यम से सलाह दी जा रही है। लोग जागरूक हों और शादी से पहले जेनेटिक टेस्ट कराएं तो इस बीमारी को पूरी तरह रोका जा सकता है।
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