पीजीआईएमएस के आपातकालीन विभाग में दवा की खरीद में घोटाले की भनक के बाद भी अधिकारी सोए हुए हैं। विभाग को स्टोर से दवा नहीं मिल पा रही है, मजबूरन विभाग के अधिकारी रोजाना की दवाएं रेट कांट्रेक्ट से खरीद रहे हैं। जबकि आरोप है कि जो दवाएं रेट कांट्रेक्ट से ली जा रही हैं उनकी कीमत बाजार में कम है। इस मामले में हुई पहली जांच में जब तथ्य सही पाए गए तो अगली जांच स्टेट विजिलेंस को सौंपने की बात कही गई। आलम यह है कि विभाग में बृहस्पतिवार को एक बार फिर एंटीबायोटिक दवा का स्टाक बिल्कुल समाप्त हो गया।
इंजेक्शन, सिरिंज और दवा नहीं होने से परेशान आपातकालीन विभाग के पास न तो अतिरिक्त बजट है और न ही यहां आने वाले मरीजों की संख्या में कमी हो रही है। यहां एक दिन में महज 50 हजार रुपये तक की दवा खरीदी जा सकती है, जबकि 1400 से 1600 मरीज 24 घंटे में उपचार कराने पहुंचते हैं। सूत्रों का कहना है कि यहां समस्या यह है कि वर्ष 2014 में हुए रेट कांट्रेक्ट के हिसाब से दवाएं विभाग में अधिक महंगी कीमत में आती हैं। जबकि यदि सही हिसाब से दवा आएं तो इतने बजट में ही काफी दवाएं आ सकती हैं। सबसे बड़ी हैरानी यह है कि रेट कांट्रेक्ट का हर वर्ष नवीनीकरण होता है, जबकि संस्थान में ऐसा नहीं है। ऐसे में आपात विभाग की मजबूरी है कि उसे पुराने रेट कांट्रेक्ट पर ही दवा की खरीददारी करनी पड़ रही है। हालांकि अगले माह यह कांट्रेक्ट खत्म होने वाला है।सूत्रों की मानें तो इस मामले में डीएमएस, एमएस और निदेशक कार्यालय तक पर गाज गिर सकती है। क्योंकि बाजार में सस्ती दवा उपलब्ध होने के बावजूद रेट कांट्रेक्ट में महंगी दवाओं को खरीदा गया है।
यूं जानें रेट कांट्रेक्ट को
आपात विभाग को अचानक जरूरत पड़ने पर जब दवा स्टोर में नहीं मिलती है तो वह दवा बाहर से खरीदी जाती है। इसके लिए निदेशक कार्यालय की ओर से कुछ दवा कंपनियों के साथ रेट कांट्रेक्ट होता है। पूरे वर्ष इसी दर पर दवाएं उपलब्ध करवाई जाती हैं।
तय रेट पर ही मंगाते हैं दवा
आपातकालीन विभाग में जो दवा समाप्त होती है, हम मंगा देते हैं। विभाग तय रेट कांट्रेक्ट के आधार पर ही दवा मंगाता है। बाकी जांच के संबंध में संबंधित अधिकारी ही बता सकते हैं।
- डॉ. संदीप, डीएमएस, आपातकालीन विभाग, पीजीआईएमएस।