तेलंगाना और पश्चिम बंगाल की तर्ज पर प्रदेश के डॉक्टर भी डिप्लोमेट ऑफ नेशनल बोर्ड (डीएनबी) का तीन वर्षीय कोर्स जिला अस्पतालों में करके विशेषज्ञ की सेवाएं दे सकेंगे। स्वास्थ्य मंत्री अनिल विज के निर्देश पर इस अहम प्रक्रिया को मूर्तरूप देने की तैयारी चल रही है। यह कोर्स जरनल सर्जरी, एनेस्थिसिया, महिला रोग, बाल रोग और फैमिली मेडिसन में होगा। इस कोर्स को करने के बाद डॉक्टर एमडी के समकक्ष होंगे।
शुक्रवार को हेल्थ यूनिवर्सिटी में इस संबंध में पंडित भगवत दयाल शर्मा स्वास्थ्य विज्ञान विश्वविद्यालय (पीजीआईएमएस) के अधिकारी, नेशनल बोर्ड ऑफ एग्जामिनेशन (एनबीई) और स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों की बैठक हुई। बैठक में बतौर चेयरपर्सन कुलपति डॉ. ओपी कालरा उपस्थित रहे। सुबह 11 से शाम तीन बजे तक चली बैठक में सभी ने कोर्सों को पंचकूला, अंबाला, करनाल, हिसार, भिवानी, गुड़गांव और फरीदाबाद के जिला अस्पतालों में चालू करने की बात रखी है। इस कोर्स को करने के लिए डॉक्टरों का चयन आल इंडिया लेवल की परीक्षा के बाद होगा। यह कोर्स अस्पताल के ही एक्सपर्ट डॉक्टर कराएंगे। इसकी निगरानी हेल्थ विश्वविद्यालय के अधिकार क्षेत्र में रहेगी।
इस मौके पर प्रोफेसर बिपिन बतरा एग्जक्यूटिव डायरेक्टर एनबीई, प्रोफेसर भाबातोश विश्वास कुलपति पश्चिम बंगाल हेल्थ यूनिवर्सिटी, उपकुलपति हेल्थ विवि रोहतक के डॉ. वीके जैन, रजिस्ट्रार डॉ. एचके अग्रवाल एवं खानपुर, मेवात, अग्रोहा मेडिकल कालेज के निदेशक उपस्थित रहे। वहीं, स्वास्थ्य विभाग से डीजीएचएस डॉ. कमला सिंह, अतिरिक्त महानिदेशक डॉ. प्रवीण गर्ग, निदेशक डॉ. राजीव बडेरा और सभी जिलों के सिविल सर्जन एवं कार्यकारी सिविल सर्जन डॉ. कुलदीप उपस्थित रहे।
60 हजार एमबीबीएस के लिए महज 15 हजार पीजी की सीट
कार्यकारी सिविल सर्जन डॉ. कुलदीप ने बताया कि हर साल देश में 60 हजार एमबीबीएस डॉक्टर तैयार होते हैं। लेकिन देश में पीजी कोर्स के लिए महज 15 हजार सीटें हैं। इसलिए देश में विशेषज्ञों की कमी बनी रहती है। देश के 439 मेडिकल कालेजों में ही पीजी कोर्स कराये जाते हैं। लेकिन एनबीई की मंजूरी मिलने से प्रदेश में विशेषज्ञों की समस्या का समाधान हो जाएगा।
बोले कुलपति
डीएनबी कोर्स शुरू होने से मरीजों को विशेषज्ञ डाक्टरों के लिए दूर नहीं जाना पड़ेगा। प्रदेश सरकार हर जिले में एक मेडिकल कालेज बनाने की तैयारी में है, लेकिन प्रत्येक मेडिकल कालेज के निर्माण में करीब 500 करोड़ की लागत और अन्य चुनौतियां आएंगी। इनके बनने के नौ साल बाद ही विशेषज्ञ मिलेंगे। अगर हम जिला अस्पताल को अपग्रेड करके और एनबीई से पीजी कोर्स शुरू करते हैं तो तीन साल में विशेषज्ञ चिकित्सक मिल सकते हैं। सिविल अस्पताल में पीजी कोर्स शुरू करने के लिए 10 से 15 करोड़ रुपये चाहिए होंगे।
- प्रोफेसर ओपी कालरा, कुलपति, हेल्थ विवि रोहतक