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शोध ः जैनरिक की तुलना में पेटेंट दवाओं का अधिक चलन

Wed, 24 Aug 2016 02:29 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, रोहतक
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ज्योति - फोटो : अमर उजाला
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महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय स्थित फार्मास्यूटिकल विभाग की एमफार्मा छात्रा ज्योति जांगड़ा ने एक शोध किया है। यह शोध डब्ल्यूएचओ की गाइडलाइन के दिशा निर्देशानुसार नगर निगम से अनुमति ले कर जिले के 76 केमिस्ट शॉप पर किया गया है। चौंकाने वाली बात सामने आई है कि इमरजेंसी और क्रोनिक बीमारियों के उपचार में जेनेरिक दवाओं की तुलना में पेटेंट दवाओं का अधिक चलन है। बाजार में एक जेनेरिक दवा के कई-कई ब्रांड उपलब्ध हैं। 
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एमडीयू के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. नीरज गिलहोत्रा के निर्देशन में प्रस्तुत ज्योति की शोध रिपोर्ट के अनुसार पीजीआई, सामान्य अस्पताल और अन्य स्वास्थ्य केंद्रों में एक ही बीमारी की अलग-अलग दवाएं लिखी जाती हैं। दवा कंपनियों के नाम के अलावा उनकी कीमतों में भी काफी अंतर है। अधिकांश डॉक्टर जेनेरिक दवा की जगह ब्रांड वाली दवाएं प्रयोग में लाते हैं। उन्होंने शोध में रोहतक की 42, सांपला की 18 और महम की 16 केमिस्ट शॉप को इसमें शामिल किया है। क्रोनिक बीमारी में एपीलेप्सी, हाइपर टेंशन, अलसर, डायबिटीज, थायराईड, अस्थमा आदि की दवाओं पर सर्वे किया गया। इसमें रोहतक की अपेक्षा महम और सांपला की दवाओं की कीमत में अंतर मिला। ज्योति ने बताया कि सामने आया है कि जो दवाएं मरीज खा रहे हैं, उनके अन्य विकल्प बाजार में कम कीमतों में उपलब्ध हैं। इससे मरीज को लाभ होगा कि वह केमिस्ट शॅाप पर और डॉक्टर से जेनेरिक दवा की मांग करेगा। जेनेेरिक दवाओं की तुलना में ब्राडेंड दवाओं की कीमत कई गुणा अधिक है। 

बोले शिक्षक
हर देश की आवश्यक मेडिसन वहां की जरूरतों और परिस्थितियों के हिसाब से बनती हैं। इसके लिए डब्ल्यूएचओ से प्रमाणित लिस्ट होती है। आपातकालीन और क्रोनिक बीमारियों की दवा हर जगह उपलब्ध होनी चाहिए। डब्ल्यूएचओ के अनुसार हर शोध में विद्यार्थियों से दवा की उपलब्धता, कीमत, स्थान, नाम आदि का डाटा एकत्रित करते हैं। इसके अंतिम में एक बुकलेट तैयार की जाती है, इसमें पूरे शोध का निचोड़ होता है। इसे हम स्वास्थ्य विभाग को भेजेंगे, जिससे डॉटा के अनुरूप वह उचित कार्रवाई कर सके। 
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डॉ. नीरज गिलहोत्रा, एसोसिएट प्रोफेसर, फार्मास्यूटिकल विभाग, एमडीयू   
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