अंग्रेजों के खिलाफ आजादी के लिए साल 1857 में हुए प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भागीदारी की कीमत देश के उस भूभाग को चुकानी पड़ी जिसे आज हरियाणा कहते हैं। देश के इस बड़े हिंदीभाषी भू-भाग को अंग्रेजों ने फरवरी 1858 में पंजाब राज्य में मिला दिया। हरियाणावासियों की पीड़ा करीब 64 साल तक अनसुनी रही।
इतिहासकार डॉ. दयानंद कादियान के अनुसार साल 1925 में अखिल भारतीय मुस्लिम लीग के दिल्ली अधिवेशन में रोहतक के महम निवासी पीरजादा मोहम्मद हुसैन ने सबसे पहले हरियाणा को पंजाब से अलग करने की मांग उठाई थी। उन्होंने हरियाणा को दिल्ली में मिलाने की मांग उठाई थी। देश आजाद हुआ तब एक अक्तूबर 1949 से लागू सच्चर फार्मूले के अंतर्गत संयुक्त पंजाब को पंजाबी और हिंदी भाषी दो क्षेत्रों जालंधर डिविजन और रोहतक डिविजन में बांट दिया गया।
हिन्दी भाषी क्षेत्र में तत्कालीन रोहतक, गुड़गांव (अब गुरुग्राम), करनाल, अंबाला की जगाधरी व नारायणगढ़ तहसील शामिल की गईं। आर्य समाज ने 30 अप्रैल 1957 से हिन्दी रक्षा आंदोलन चलाया। पंजाबी सूबे के गठन के लिए संत फतेह सिंह ने अकाल तख्त के सामने मरणव्रत का एलान कर दिया तो हरियाणा की ओर से प्रोफेसर शेर सिंह, आचार्य भगवान देव व चौधरी देवीलाल ने भी हिंदी भाषी राज्य बनाने के लिए मोर्चेबंदी की।
केंद्रीय गृह मंत्री ने 23 सितंबर 1965 को संसद के दोनों सदनों में पंजाब राज्य के पुनर्गठन के संबंध में संसदीय समिति के गठन की घोषणा की। इस समिति के अध्यक्ष सरदार हुक्म सिंह बनाए गए। इस समिति ने पंजाब का पुनर्गठन स्वीकार कर लिया। सिफारिश को मानते हुए भारत सरकार ने 23 अप्रैल 1966 को तीन सदस्यीय आयोग का गठन किया। जस्टिस जेसी शाह की अध्यक्षता में बने आयोग में एस दत्त और एमएम फिलिप को शामिल किया गया। इस आयोग ने 31 मई 1966 को अपनी रिपोर्ट पेश की।
इस रिपोर्ट में तत्कालीन हिसार, महेंद्रगढ़, रोहतक, अंबाला, कुरुक्षेत्र, गुरुग्राम, संगरूर जिले की नरवाना व जींद तहसील, खरड़ तहसील, नारायणगढ़ व जगाधरी को मिलाकर हरियाणा राज्य के गठन की सिफारिश की गई। इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने 18 सितंबर 1966 को पंजाब पुनर्गठन अधिनियम पारित किया। इस विधेयक के आधार पर पहली नवंबर 1966 को भारत के नक्शे पर हरियाणा एक अलग राज्य के रूप में अस्तित्व में आया।
पंजाब से अलग होकर हरियाणा को जमीन तो मिल गई, लेकिन नदी जल के बंटवारे पर पंजाब के राजी न होने से सूबे की प्यास अधूरी रह गई। बाबू जगजीवन राम समिति, इंदिरा अवार्ड और डीपी धर की अध्यक्षता में बनी समिति ने अपनी-अपनी रिपोर्ट में हरियाणा को पानी देने की सिफारिश तो की, लेकिन पंजाब के राजनेताओं ने इस सूबे को उसके हक से वंचित रखा। न्यायालयों की सलाह को भी पंजाब सरकार ने अब तक दरकिनार ही किया है।
इराडी ट्रिब्यूनल और मैथ्यू आयोग के फैसले को मानने से तत्कालीन पंजाब सरकार ने इन्कार कर दिया। पंजाब सरकार ने साल 2005 में पंजाब समझौता निरस्तीकरण विधेयक पारित करके हरियाणा को पानी देने के लिए बन रही एसवाईएल नहर के अपने हिस्से को खुर्द बुर्द कर दिया। इससे दक्षिण हरियाणा में पर्याप्त पेयजल और खेती के लिए पानी की आपूर्ति का ख्वाब अधूरा रह गया है।
इसीलिए राज्य के संपूर्ण विकास में सबसे पहली चुनौती पूरे हरियाणा में पानी पहुंचाने की है। जलजीवन मिशन लागू होने के बावजूद बड़ी आबादी लगातार पेयजल की उपलब्धता से महरूम है। नहरी सिंचाई तंत्र को मजबूत कर खेतों तक पानी पहुंचाना भी बड़ा काम है।
जी-20 देशों के प्रतिनिधियों को झज्जर के एक गांव में लाना भले ही सराहनीय कदम है, लेकिन पर्यटन के नक्शे पर भी अभी तक हरियाणा की मजबूत उपस्थिति नहीं है। प्रदेश का ऐसा कोई हिस्सा नहीं है, जहां ऐतिहासिक धरोहरें नहीं हैं, लेकिन उनके उचित रखरखाव और सुविधाओं के अभाव के चलते सैलानियों की राज्य में आमद बढ़ नहीं पा रही है।
पहली बार राज्य में एक ही दल की लगातार तीसरी बार सरकार बनी है और केंद्र में भी उसी दल की सत्ता होने से हरियाणा के लोगों को उम्मीद जगी है कि उनकी प्यास भी बुझेगी और पानी पाकर उनकी जमीनें फसलों के रूप में सोना उगलेंगी। इसके साथ ही पर्यटन उद्योग संवरेगा तो रोजगार और कारोबार भी नई ऊंचाई छू सकेगा।