कोरोना को मात देने वाली कोविशिल्ड वैक्सीन सभी जगह पहुंच चुकी है। इस लाइव एटिनियूवेटिड वैक्सीन को लेकर सामान्य वर्ग के अलावा चिकित्सक वर्ग में भी खास चर्चा है। इस वैक्सीन को चिंपैंजी के एडिनो वायरस को जैनिटिकली इंजीनियरड करके कोरोना के स्पाइक प्रोटीन को डालकर तैयार किया जाता है। एडिनो वायरस मानव के लिए नुकसानदायक नहीं होता है, बल्कि यह कोरोना संक्रमण से बचाने में मददगार होगा।
पीजीआईएमएस में कोवैक्सीन की रिसर्च के को-इन्वेस्टिगेटर डॉ. रमेश वर्मा ने बताया कि लाइव वैक्सीन दो तरह की होती है। इसमें बीमारी का लाइव एटिनियूवेटिड वायरस शरीर में भेजा जाता है, जबकि दूसरे में लाइव वायरस किसी और का होता है और जिस बीमारी से बचाना होता है उसके वायरस का एक पार्ट प्रयोग होता है।
कोविशिल्ड वैक्सीन चिंपैंजी के एडिनो वायरस लाइव एटिनियूवेटिड वायरस से लेकर बनाई गई है, इसमें कोरोना का स्पाइक प्रोटीन डाला गया है। चिंपैंजी का एडिनो वायरस अन्य वैक्सीन में भी प्रयोग होता है, इसलिए इससे घबराने की जरूरत नहीं है।
कोवैक्सीन की रिसर्च में शामिल लोग घबराएं नहीं : डॉ. वर्मा
अनुसंधानकर्ता डॉ. रमेश वर्मा ने बताया कि कोवैक्सीन की रिसर्च में शामिल कई लोगों को अब यह लग रहा है कि कोविशिल्ड आ गई है, वह इसे लगवा सकते हैं। लेकिन उन्हें किसी बात से घबराने की बजाय अपनी वैक्सीन के एंटी बॉडी बनने का इंतजार करना चाहिए।
वैक्सीन की पहली डोज लगने के 42 दिन बाद जांच में यदि व्यक्ति के शरीर में एंटीबॉडी नहीं मिलती तो माना जाएगा कि उसे प्लेसिबो लगी है। इस पर कंपनी उसे कोवैक्सीन की डोज उपलब्ध करवाएगी। दो अलग-अलग वैक्सीन लगवाने का किसी को अतिरिक्त लाभ नहीं मिलेगा।
कोवैक्सीन आई शहर में और गुरुग्राम भेजी गई
कोविशिल्ड वैक्सीन के साथ कोवैक्सीन की एक खेप भी जिला सिविल सर्जन कार्यालय पहुंची। चंद मिनटों बाद ही यह खेप गुरुग्राम के लिए रवाना कर दी गई। अधिकारियों ने बताया कि गुरुग्राम पहले भी 20 हजार के करीब डोज जा चुकी हैं। वह कुरुक्षेत्र से अपनी गाड़ी में कोवैक्सीन का बॉक्स भी लाए थे। इसके अलावा उन्होंने झज्जर, महेंद्रगढ़, सोनीपत व पानीपत के हिस्से की वैक्सीन सौंप दी है। कोवैक्सीन की रिसर्च में शामिल लोगों ने बताया कि इस वैक्सीन की 26 हजार से अधिक लोगों पर रिसर्च की जा चुकी है।