रोहतक। खाने के लिए जेब में कुछ बिस्कुट थे। पीने का पानी नहीं था। पास जमा हुई बर्फ चूस लेते थे। पहाड़ पर कोहनियों के बल आगे बढ़ते बढ़ते त्वचा छिल गई, पेंट फट गई थी, जूतों के बक्कल टूट गए थे। रात का तापमान भी करीब मानइस पांच डिग्री था। दिन में भी कड़ाके ठंड रहती थी। इन सबके बीच जीत का जोश उनमें गर्मी बनाए हुए था। देश के लिए कुछ कर गुजरने का जज्बा और जीत का जोश पहाड़ की चोटी तक ले गया। यहां कैप्टन अनुज अय्यर व हवलदार हरिओम की बहादुरी भी भुलाए नहीं भूलती। इन्होंने बगैर हथियार दुश्मन के खेमे में घुसकर उन्हें ललकारा। हाथापाई वाली लड़ाई रोंगटे खड़े कर देने वाली थी। यह कहना है कारगिल युद्ध में दुश्मनों के दांत खट्टे करने वाले 17 जाट रेजिमेंट के जवानों का। कारगिल युद्ध की 21वीं वर्षगांठ पर अमर उजाला से हुई बातचीत में जवानों ने युद्ध की याद ताजा की।
दुश्मन की जानकारी बगैर चढ़ रहे थे पहाड़
सेना की 17 जाट रेजिमेंट के हुमायुंपुर निवासी पूर्व हवलदार सतवीर धनखड़ ने बताया कि उनकी बटालियन 25 मई 1999 को द्रास सेक्टर पहुंची थी। उस समय सिर्फ इतनी जानकारी थी कि कुछ घुसपैठिए हैं। दुश्मन कौन, कहां व कितनी संख्या में है। इसकी कोई जानकारी नहीं थी। श्रीनगर से लेह जाने वाली सड़क पर 4875 पोस्ट पर कब्जा करना था। यहां से सड़क से गुजरते वाहन साफ नजर आते थे। मश्कोह वैली पर भी यहीं से नजर रखी जा सकती है। इसी रास्ते दुश्मन को रसद जा रही थी। बटालियन की चारों कंपनियों को हमले के लिए अलग टारगेट मिला। हमारी ब्रेव कंपनी को .4540 पर कब्जा करना था। हमने 26 को पहला सफल अटैक किया। जबकि दूसरी कंपनियों ने व्हेल बैक, पिंपल एक व दो पर कब्जा किया। सेना की 13 जेएंडके राइफल्स ने .4875 पोस्ट पर कब्जा किया। सेना को चार जुलाई को मिली सफलता के बाद दुश्मन ने हमें आगे नहीं बढ़ने दिया। इसके बाद दुश्मन की रसद व उन्हें मदद मिलने वाला मश्कोह नाले का रास्ता रोकने का लक्ष्य मिला। यह सफलता मिलने के बाद दुश्मन के हौसले पस्त हुए। यह लड़ाई ताउम्र याद रहेगी। यही नहीं छोटा बेटा प्रवीण हैदराबाद में 22 जुलाई को ही आर्टलरी यानी तोपखाना रेजिमेंट में क्लर्क पद पर नियुक्त हुआ है। बड़ा बेटा नवीन एमटेक कर रहा है।
दिन में पत्थर की तरह पड़े रहना रात में आगे बढ़ना
सेना की 17 जाट रेजिमेंट के पूर्व सूबेदार सेक्टर चार निवासी सूरत सिंह कमांडो प्लाटून के प्लाटून हवलदार रहे हैं। श्रीनगर से अपनी बटालियन के साथ द्रास सेक्टर आए। यहां माइनस पांच डिग्री तापमान में दुश्मन से लोहा लेने का मौका मिला। पिंपल टू हिल पर चार्ली कंपनी ने आठ जुलाई की रात हमला किया था। इसके बाद दुश्मन ने काउंटर अटैक किया। इसके बचाव में कंपनी ने दिन में हमला किया। शेष हमले रात के समय हुए। दिन भर जवान पहाड़ों पर पत्थरों की ओट में पत्थर की तरह पड़े रहते थे। थोड़ा हिलने पर भी गोलियों की बौछार आती थी। रात होते ही हम अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते थे। यह लड़ाई बड़ी संघर्षशील थी। विषम परिस्थितियों में 16 हजार फीट ऊपर बैठे दुश्मन को मारना था। वह भी 80 प्रतिशत ढलान वाली पहाड़ी पर। लड़ाई के आखिरी तीन दिन तो सबसे मुश्किल रहे। बगैर कुछ खाए, बस लड़ते रहे। देश सेवा के लिए अब छोटा बेटा सरेंद्र सिंह भी सेना में भर्ती हो गया है। इन दिनों वह अंबाला में है। बड़ा बेटा सतेंद्र सिंह एमडीयू के होटल मैनेजमेंट में सेवाएं दे रहा है।
बिस्कुट व बर्फ खाकर भरा पेट
सेना की 17 जाट रेजिमेंट के पूर्व नायब सूबेदार सनसिटी निवासी देवव्रत मलिक मूलरूप से पुट्ठी गांव के रहने वाले हैं। इनका बेटा विकास मलिक ऑस्ट्रेलिया की एक निजी कंपनी में नौकरी करता है। नायब सूबेदार का कहना है कहने को तो 21 साल हो गए, मगर अब भी वह दिन भूले नहीं भूलता। बड़ा मुश्किल समय था। ऊपर से गोलियां, बम बरस रहे थे। माइनस पांच डिग्री तापमान की हाड़ कंपा देने वाली ठंड उन्हें जमा रही थी। इस पर भी खाने पीने तक को तरस गए थे। पत्थरों की ओट में छिपकर जेब में पड़े बिस्कुट खाकर पेट भरा। प्यास लगी तो पास पड़ी बर्फ उठा कर चूस ली। हालात इतने मुश्किल थो कि पानी लेकर हमारे पास ऊपर आने वाला खुद प्यास से बेहाल हो जाता था। कई बार तो प्यास से हाल बुरा होने पर वह खुद ही पानी पी लेता था। इन सब मुश्किलों के बाद सिर्फ एक ही लक्ष्य था, अपनी जमीन से दुश्मन को खदेड़ना। हर जवान जी जान से लड़ा और आखिर में जीत दर्ज की।
पेंट फट गई जूतों के बक्कल टूट गए
सेना की 17 जाट रेजिमेंट के पूर्व हवलदार घिलौड कलां निवासी अजमेर सिंह सेवानिवृत्ति के बाद एसबीआई में गार्ड हैं। इनका कहना है कारगिल लड़ाई की याद आते ही, खाना-पीना सब याद आ जाता है। लड़ते हुए पेंट फट गई थी। जूतों के बक्कल टूट गए। कड़ाके की ठंड, गोलीबारी और जीत का लक्ष्य, बस यही था। हर रात थोड़ा-थोड़ा पहाड़ पर ऊपर चढ़ रहे थे। खाने का तीन दिन का राशन साथ लिया था। यह भी कम था। राशन से ज्यादा जवानों ने बारूद उठाया था। रसद से ज्यादा लड़ाई के लिए हमें गोला बारूद चाहिए था। यही नहीं थोड़ा बहुत जो खाना साथ लिया था। उसका भी 70 प्रतिशत जवानों ने तो दाना तक नहीं खाया। लड़ने की धुन में खाने का समय मिला न ध्यान रहा। यह खाना बैगों में ही पड़ा रहा। जीत के बाद राहत की सांस ली। बेटा मोहित भी सेना की इंजीनियरिंग विंग में भर्ती हुआ है।