जाट न्याय धरने के बीच सरकार ने पिछले साल के दंगा पीड़ितों को राहत देनी शुरू कर दी है। दंगे में मारे गए पांच लोगों के परिजनों को जिला प्रशासन ने शुक्रवार को नौकरी दे दी। प्रशासन ने इनमें से तीन के ज्वाइन करने की बात कही है। जबकि दंगे के मारे गए नितिन के पिता सुरेंद्र शर्मा ने बेटे शुभम को मिली नगर निगम में डीसी रेट की क्लर्क की नौकरी को नकारते हुए पक्की सरकारी नौकरी देने की मांग की है। वहीं, दंगे में मारे गए मंजीत की पत्नी सुमन को नौकरी देने का मंजीत की मां राजबाला ने विरोध किया है। राजबाला का कहना है कि उसकी बहू सुमन मायके में रहती है। उसने बेटा खोया है तो नौकरी उसे मिलनी चाहिए।
बता दें कि पिछले साल जाट आरक्षण आंदोलन के दौरान भड़के दंगे में पांच लोगों नितिन, मंजीत, रवींद्र, प्रदीप और राहुल की मौत हो गई थी। पिछले साल सरकार ने राहुल के अलावा अन्य चार मृतकों के निर्दोष मानते हुए परिजनों को 10-10 लाख का मुआवजा दे दिया था, लेकिन नौकरी नहीं दी थी। राहुल दांगी की मौत 19 फरवरी को गोली लगने से हुई थी। संघर्ष समिति राहुल को शहीद मानते हुए 19 फरवरी को शहीदी दिवस मनाने का एलान कर रखा है। अब जबकि फिर से आंदोलन शुरू हो गया है तो सरकार ने दंगे में मारे गए पांचों लोगों के परिजनों को नौकरी देने का दावा किया है। हालांकि, यह डीसी रेट की नौकरी है। जबकि पीड़ितों के परिजन सरकारी पक्की नौकरी की मांग कर रहे हैं।
सास बोली, बहू के बजाय मुझे मिले नौकरी
करतारपुरा निवासी मंजीत की पिछले साल के दंगों में मौत हो गई थी। उसका शव हिसार रोड पर मिला था। जिला प्रशासन ने सरकार के निर्देश पर शुक्रवार को मंजीत की पत्नी सुमन को नौकरी दे दी। अब मंजीत की मां राजबाला और पिता जयभगवान का कहना है कि उनकी बहू सुमन दोनों बच्चों को लेकर अपने मायके फतेहाबाद जा चुकी है। उसकी बजाय मंजीत की मां राजबाला को नौकरी दी जाए। माता-पिता का कहना है कि मंजीत की मौत के बाद उनका कोई सहारा नहीं बचा है। उनके एक बेटे की 10 साल पहले एक हादसे में मौत हो गई थी, जबकि दंगों में मंजीत की जान चली गई। अब उनकी देखभाल करने वाला कोई नहीं है। मंजीत की बहू भी अपने मायके चली गई है। ऐसे में उनका गुजारा कैसे होगा?
पोते और पोती के साथ अदालत पहुंचे दादा-दादी
मंजीत की मां राजबाला और पिता जयभगवान ने फैमिली कोर्ट में याचिका दाखिल की है कि मंजीत की पत्नी सुमन दोनों बच्चों को लेकर मायके चली गई। जबकि बच्चों के असली अभिभावक वे हैं। उनकी कस्टडी उन्हें दी जाए। मामले की 16 फरवरी को सुनवाई होगी।
परिजन खुद फैसला करें : बल्हारा
अखिल भारतीय जाट आरक्षण संघर्ष समिति के प्रदेश प्रभारी अशोक बल्हारा का कहना है कि झज्जर से मेरे पास फोन आया था कि प्रशासन डीसी रेट पर नौकरी देने के लिए आवेदन मांग रहा है। ज्यादातर ने डीसी रेट पर नौकरी लेने से मना कर दिया है। रोहतक में ज्वाइनिंग लेटर लेने के बारे में पता नहीं है। अगर कोई परिवार डीसी रेट पर नौकरी करना चाहता है तो समिति को कोई आपत्ति नहीं है।