देश और प्रदेश में स्वर्ण क्रांति के उद्भाव के बाद कृषि में विविधिकरण बहुत जरूरी है। कृषि विविधिकरण या तो फसलों के पैटर्न में बदलाव या अन्य गैर कृषि विकल्पों को दर्शाता है, जो उच्च स्तर की आय बढ़ाने में मदद करते हैं। इन विकल्पों में पशुपालन, मुर्गी पालन और बागवानी शामिल हैं।
उपायुक्त कैप्टन मनोज कुमार ने किसानों का आह्वान किया कि वे अपनी आमदनी बढ़ाने को कृषि में विविधिकरण को अपनाएं। ऐसा करके वे जोखिम कारकों को कम कर सकते हैं क्योंकि कृषि विविधिकरण अपनाने से यदि मौसम फसल के उत्पादन के अनुकूल नहीं रहता है तो भी किसान अपने सभी संसाधन नहीं खोते हैं। क्योंकि कई फसलों को एक छोटे से खेत से काटा जा सकता है। इसलिए उत्पादन दस गुणा तक बढ़ सकता है, जिससे पर्याप्त आय सुनिश्चित होती है। कृषि विविधिकरण से ग्रामीण क्षेत्रों में अतिरिक्त रोजगार सृजित होते हैं। इससे मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है, कीट नियंत्रित रहते हैं। उन्होंने कहा कि कृषि विविधिकरण मुख्य रूप से दो प्रकार का होता है। पहला क्षैतिज विविधिकरण के तहत एक ही फसल की खेती जैसे गेहूं-धान, गेहूं-कपास के बजाय कई फसलों से संबंधित है। जैसे मिश्रित मौसमी सब्जियों की कास्त छोटे किसानों के लिए काफी उपयोगी है। कृषि विविधिकरण का दूसरा प्रकार वर्टिकल विविधिकरण के तहत फसलों के साथ-साथ औद्योगीकरण के समावेश को दर्शाता है। इसके तहत किसान एक और कदम उठाते हैं और फसल उत्पादन के साथ-साथ संबंधित औद्योगिकीकरण में भी निवेश करते हैं। किसान फल, सब्जी, फूल, खुंभी, शहद उत्पादन के साथ जैम, जैली, मुरब्बा, चटनी व अचार में निवेश कर सकते हैं।