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देशभक्तों को फांसी मिल सकती है तो गुनहागारों को क्यों नहीं...?

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अमर उजाला के ‘अपराजिता 100 मिलियन स्माइल’ के तहत शुक्रवार को सिटी कार्यालय में आयोजित संवाद कार्य?
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जब देश की आजादी में अहम भूमिका निभाने वाले शहीद भगत सिंह जैसे देशभक्तों को समय से पहले फांसी मिल सकती है तो गुनहागारों को क्यों नहीं...? वो स्टे पर स्टे लिए जा रहे हैं और कानून मजाक बनकर रह गया है। कैंडल मार्च या सिर्फ सजा सुना देना भर किसी समस्या का समाधान नहीं। दुष्कर्म करने वाले आरोपी समाज में फै ले संक्रमण जैसे हैं, जो सिर्फ समाज में गंदगी फैलाने का काम कर रहे हैं। अगर इन्हें दंड न मिला तो जनता जनार्दन का कानूनी व्यवस्था से विश्वास उठ जाएगा और उन्हें हर हैदराबाद का एनकाउंटर सही फैसला लगेगा। इसलिए निर्भया के गुनहागारों को बगैर किसी देरी के फांसी पर चढ़ा देना चाहिए। जब राष्ट्रपति भी दरिंदों की दया याचिका खारिज कर चुके हैं, तो फिर देरी क्यों? शुक्रवार को अमर उजाला के अपराजिता 100 मिलियन स्माइल के तहत सिटी कार्यालय में आयोजित संवाद कार्यक्रम में महिलाओं ने सजा की मां व कानून में संशोधन पर जोर दिया।
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वो स्टे पर स्टे लिए जा रहे हैं और कानून का मजाक बना रहे हैं। जब देशभक्तों को समय से पहले फांसी दी जा सकती है तो दोषियों को फैसले के बावजूद भी क्यों बख्शा जा रहा है...? क्या हमारी सरकार और कानून व्यवस्था किसी और निर्भया की मौत का इंतजार कर रही है। अगर कानूनी दांव पेचों में वकीलों ने अपनी वकालत के दम पर इनकी फांसी रुकवा दी तो लोगों का कानून से और जनता का इंसानियत से विश्वास उठ जाएगा। क्या उन वकीलों में जरा सी भी इंसानियत नहीं जो ऐसे आरोपियों की पैरवी कर रहे हैं।
- राजबाला कादियान, नर्सिंग सिस्टर
हैदराबाद में दिशा के आरोपियों का पुलिस एनकाउंटर एकदम सही फैसला था। इसी तरह निर्भया के आरोपियों का भी सात साल पहले ही एनकाउंटर कर देना चाहिए था। इतने समय तक निर्भया के अभिभावकों को दर-दर न्याय की आस में ठोकरें तो न खानी पड़ती और दुष्कर्म जैसा अपराध करने वाले गुनाहगारों के मन में पुलिस और कानून व्यवस्था का डर पैदा होता।
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- नेहा बतरा, छात्रा
हमें फास्ट टैग कोर्ट की सुविधा तो मिली लेकिन उसका इस्तेमाल करने का अधिकार नहीं। क्या यह कानून व्यवस्था व सरकार एक और निर्भया के मरने का इंतजार कर रहे हैं। आरोपियों को सात दिन का ओर समय क्यों दिया गया। क्यों इन जघन्य अपराध करने वाले गुनाहगारों की कानूनी आड़ में सुरक्षा की जा रही है...? वो हमारे दिए टैक्स से जेल में बैठे मुफ्त की रोटियां तोड़ रहे हैं और निर्भया के अभिभाव न्याय की आस में भटक रहे हैं, आखिर कब तक यूं ही चलता रहेगा...?
- देबिना बधवार, रिसर्च स्कॉलर
जल्द से जल्द इंसाफ होना बहुत जरूरी है, क्योंकि इंसाफ में जितनी देरी होगी अपराधियों के मन का खौफ उतना ही कम हो चुका होगा। अब निर्भया को इंसाफ इसलिए भी चाहिए की लोगों का कानून में विश्वास बना रह सकें। हमारे देश में आलम ये है कि कई-कई सालों तक भी लोगों को इंसाफ नहीं मिल पाता। सरकार से अनुरोध है कि आरोपियों को जल्द से जल्द फांसी हो, जिससे निर्भया के साथ-साथ उसके अभिभावकों को भी न्याय मिल सकें।
- डॉ. मंजू बधवार, प्राचार्या, सतप्रिया कॉलेज ऑफ एजूकेशन
दुष्कर्म जैसा अपराध करने वाला क्या नाबालिक और क्या बालिक। क्या वह नाबालिक उस वक्त नाबालिक नहीं था, जब वह इस जघन्य अपराध को अंजाम दे रहा था, तो वह अब सजा के वक्त नाबालिक कैसे हो गया? क्या वह तीन साल की बच्ची नाबालिक नहीं थी, जिसकी दुष्कर्म के बाद निर्ममता से हत्या कर दी गई। फिर क्यों हमारा कानून इतना लचीला है कि ऐसे आरोपियों को बच निकलने का मौका मिल जाता है।
- अंजू बतरा, गृहिणी
भारत ही एकमात्र ऐसा देश है जहां ऐसे जघन्य अपराधियों को भी कानून बच निकलने का मौका देता है। दुबई और साउदी अरब जैसे देशों में ऐसे आरोपियों को सरेआम जा-ए-मौत दी जाती है। निर्भया के अरोपियों को तो 23 जनवरी को फैसला आते ही फांसी हो जानी चाहिए थी, इतना लंबा समय लगा ही क्यों...? इस पूरे मामले में गलती सिर्फ कानूनी व्यवस्था की नहीं बल्कि आरोपियों के अभिभावकों की भी है, जो ऐसी विकृत मानसिकता के आरोपियों को बचाने के लिए कानूनी दांव-पेंचों की मदद ले रहे हैं।
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- पल्लवी हांडा, रजिस्ट्रार, पठानिया पब्लिक स्कूल
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